Thursday, April 16, 2020

संगीत से कुंडलिनी जागरण

संगीत से................ कुंडलिनी जागरण

                 प्राचीन काल से ही मनुष्यों का सबंध संगीत से जुडा रहा हैं । उस दौर में संगीत को मनुष्य ने अपने भाव को व्यक्त करने का एक उत्तम माध्यम बनाया था । प्राचीन काल में यह केवल एक मनोरंजन का स्त्रोत ही नहीं था । हमारे कई ऋषि मुनि संगीत शाश्त्र में निपूर्ण भी थे । और आज भी कई उच्च कोटि के योगीजन संगीत में पूर्ण दखल रखते है । उनको इस का पूर्ण ज्ञान भी है । जो भक्ती भाव में डूवे हुवे थे उन को भी संगित का रंग चढ चुका था । क्या हमने कभी सोचा था की जो हमेशा इष्ट के आनंद में रमे रहते थे । उन्हें यह बाहरी मनोरंजन के माध्यम संगीत की क्या जरुरत हैं ? कैसी कौन सी शक्ति थी की इन को भी मंत्रमुग्ध कर गयी ?
                 संगीत का मतलब आज क्या लिया जाता है ?  ये कहा नहीं जा सकता लेकिन प्राचीन काल में ये एक आध्यात्मिक माध्यम का ही हिस्सा था । संगीत के माध्यम से ही कई लोगो ने पूर्णता प्राप्त की हैं । मीराबाई या फिर नरसिंह जैसे कई उदाहरण  हमारे सामने ही हैं । तो फिर यह भेद क्यों ?
                 वास्तव में हमने संगीत को कभी समझा ही नहीं । भंवरे की गुंजन भी एक प्रकार से संगीत ही हैं । जिसे रोज सुना जाये तो आदमी धीरे धीरे विचार शून्य हो जाता हैं । सामान्य मनुष्यों को संगीत मनोरंजन का माध्यम लगता है । समय काटने का प्रबन्ध लगे लेकिन योगीजन के लिए संगीत बहुत गहरी परिभाषा लिए हुए हैं ।
                 ध्वनि की महत्ता निर्विवाद रूप से मानी जाती हैं  और एक विशेष ध्वनि कोई न कोई विशेष उर्जा प्रसारित करती ही हैं । संगीत के सप्तक या सात सूर सा रे ग म प् ध नि आदि शब्द कोई सामान्य शब्द समूह नहीं हैं । देने को तो इन ध्वनियों को कुछ भी उच्चारण दे दिया जाता है । लेकिन सा रे ग म प ध नि का गहन अर्थ हैं । जब एक विशेष लय के साथ एक मूल ध्वनि सम्मिलित होती हे तो वह शरीर में किसी एक विशेष चक्र को स्पंदित करती हैं ।
               सभी सुर अपने आप में तत्वों के प्रतिनिधि करये हैं । और हर सुर एक विशेष तत्व के ऊपर अपना प्रभुत्व रखता हैं । जिसमे सा- पृथ्वी, रे, ग – जल तत्व म, प – अग्नि तत्व ध- वायु और नि- आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करता हैं ।
               अब जिस तरह से ये सप्त सुर हैं । उसी तरह शरीर में सप्त सुरिकाए हैं । जहाँ से सुर का या ध्वनि की रचना होती हैं । यह हे सर, नासिका, मुख-कंठ, ह्रदय (फेफड़े), नाभि, पेडू और ऊसन्धि । ध्यान से देखा जाए तो ये सारी जगह शरीर के सप्त चक्रों के अत्यंत ही नजदीक हैं । अब इस तरह संगीत तंत्र में कुण्डलिनी सबंध में सप्त सुर एक एक चक्र को स्पंदित करने में सहयोगी हैं ।

सा – मूलाधार ( पृथ्वी तत्व, सुरिका- ऊसन्धि)

रे – स्वाधिष्ठान( जल तत्व , सुरिका – पेडू )

ग – मणिपुर (जल तत्व , सुरिका – नाभि )

म – अनाहत ( अग्नि तत्व, सुरिका – ह्रदय)

प – विशुद्ध ( अग्नि तत्व, सुरिका – कंठ)

ध – आज्ञा ( वायु तत्व, सुरिका – नासिका)

नि – सहस्त्रार ( आकाश तत्व, सुरिका – मस्तक)

                  इन स्वरों का, उपरोक्त स्वरिकाओ से सबंधित चक्र का ध्यान करने से चक्र जागरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती हैं । और उस से कई विशेष अनुभव होने लगते हैं । मगर ये चक्र जागरण होता हैं । भेदन नहीं होता ।
                 इसी लिए विभ्भिन रागों की रचना हुयी हैं । जिसमे ध्वनिओ के संयोग से कोई विशेष राग निर्मित किया जाता हैं  जो की वह विशेष चक्र को भेदन कर सकता हैं ।
                जैसे मालकोष राग के माध्यम से विशुद्ध चक्र को जाग्रत किया जा सकता है । इसी प्रकार कल्याण राग के निरंतर अभ्यास से भी विशुद्ध चक्र को स्पंदन प्राप्त होता है और वो जाग्रत हो जाता है । और एक बार जब ये चक्र जाग्रत हो जाता है तो साधक वायुमंडल में व्याप्त तरंगों को महसूस कर सकता है ।  उन्हें ध्वनियों में परिवर्तित कर सकता है । पर कल्याण राग जैसा राग सांयकाल के समय ही गाना उचित होता है । अर्थात सूर्य अस्त के तुरंत उपरांत । नन्द राग के द्वारा मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है, और वेदों का सही अर्थ व्यक्ति तभी समझ सकता है जब उसका मूलाधार पूरी तरह जाग्रत हो जाता है । इस राग को रात्रि के दुसरे प्रहार में गाना चाहिए । ठाट बिलाबल राग देवगिरी के प्रयोग से अनाहत चक्र की जाग्रति होती है । व्यक्ति अनहद नाद को सुनने में और उसकी शक्तियों की प्राप्ति में सक्षम हो जाता है । इसी प्रकार सभी राग किसी न किसी चक्र को स्पंदित करते ही हैं ।
                     लेकिन क्या, संगीत सिर्फ कुण्डलिनी जागरण के लिए ही हैं ? ये गहन बिचार मानसपटल में अंकुरित होना लाजमी है । पर संगीत केवल कुंडलिनी जागरण के लिये नहीं होता । संगीत की शक्ति से तानसेन ने दीपक राग का प्रयोग कर जहां दीपकों को प्रज्वलित कर दिया था वही बैजू बावरे ने संगीत के एक विशेष राग का प्रयोग कर पत्थर को पिघलाकर उसमे अपना तानपुरा दाल दिया था । और राग बंद कर दिया था । जिससे की वो तानपुरा उस पिघले हुए पत्थर में ही जम गया था । ये सब तो कुछ उदाहरण मात्र हैं । संगीत भी अपने आप में एक पूर्ण तंत्र है । ब्रम्हांड के सभी पदार्थ ५ तत्व से ही निर्मित हैं । संगीत के सप्त सुर इन ५ तत्वों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं । संगीत से किसी विशेष सुर या राग के माध्यम से हम अपना वायु तत्व बढ़ाले और भूमि एवं जल तत्व को कम करदे तो मनुष्य अद्रश्य एवं वायुगमन सिद्धि प्राप्त कर लेता हैं । यदि साधक सही तरीके से संगीत का प्रयोग करे तो बाह्य चीजों पर भी यही प्रयोग करके उसे भी अद्रश्य कर सकता है । या फिर उसके तत्वों के साथ संयोग करके तत्वों को बदल ने पर उसका परिवर्तन भी संभव हैं । या फिर संगीत के माध्यम से हवा में ही सबंधित कोई भी वस्तु के तत्वों को संयोजित कर के उसे कुछ ही क्षणों में प्राप्त किया जा सकता हैं । वास्तव में ही संगीत मात्र मनोरंजन नहीं हैं । हमारे ऋषि मुनि अत्यंत ही उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे मगर हमने उने कभी भी समझने की कोशिश नहीं की हैं । हमने जभी भी उनको देखा तो केवल तिरस्कार की दृष्टि से ही देखा । हम ने कभी उने और उनकी विशेषता को नही पहचाना । जीस की बहूत बडी कीमत हमे आज बर्तमान में चुकानी पढ रही है । आज उनकी आवश्यकता महसुस हो रही है ।

Saturday, February 1, 2020

कैरियर

ज्योतिष और शिक्षा :विषय के प्रकार :
विषय के प्रकार -मुख्य
1Engineering के मुख्य ग्रह (शनि और मंगल) ग्रहों विषयों
2. इलेक्ट्रोनिक और कॉम इंजी , बुध , गुरु , मंगल और 3हाउस
3. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग बुध , मंगल, गुरु
4. मैक् इंजीनियरिंग बुध , मंगल , शनि
5. केमिकल इंजीनियरिंग शुक्र , चंद्रमा
6. खनन इंजीनियरिंग, शनि , बुध , मंगल
7. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग शुक्र, मंगल
8. एयर कंडीशन इंजी ,शनि , मंगल
9. स्टील इंजी, शनि , मंगल
10 पेट्रो केमिकल ,चंद्रमा , शनि, मंगल, सूर्य
11. विमानन इंजी,शुक्र, मंगल ,बुध , और (3,7,11h )
मेडिकल मुख्य कारक significator विषय ग्रह
1. हार्ट विशेषज्ञ ,रवि
2. सर्जन ,सूर्य, मंगल
3. ईएनटी विशेषज्ञ ,सूर्य , बुध
4. बच्चों विशेषज्ञ, सूर्य , गुरु , बुध
5. कैंसर विशेषज्ञ ,सूर्य , गुरु
6. स्त्री रोग विशेषज्ञ ,सूर्य , शुक्र
7. नेत्र विशेषज्ञ ,सूर्य , शुक्र
8. प्लास्टिक सर्जन ,सूर्य , शुक्र
9. पाप विशेषज्ञ सूर्य, शनि
10 आयुर्वेद स्पेशल सूर्य, केतु
11. हिस्टीरिया स्पेशल ,सूर्य, राह
12. डेंटिस्ट ,सूर्य, मंगल , शुक्र व 7h
13. फार्मेसिस्ट सूर्य
14. नर्स, सूर्य, चंद्रमा , बुध
बायो विषय :ग्रह
1. बायोटेक ,सूर्य , गुरु , बुध
2. माइक्रोबायोलॉजी ,गुरु , बुध , मंगल
3. बॉटनी ,सूर्य , गुरु , बुध
4. जूलॉजी ,शनि, गुरु
वाणिज्य विषय गुरु = फाइनेंस ।, बुध = वाणिज्य ग्रहों ,विषय ग्रह
1. वित्तीय सलाहकार, सूर्य , बुध , गुरु , मंगल और 12 वीं h
2. चार्टर्ड लेखा ,सूर्य , बुध , गुरु , मंगल और 3rd h
3. राजस्व सलाहकार ,गुरु , बुध , मंगल, 2 & 11हाउस
4. सांख्यिकी ,शनि, बुध , गुरू
5. बीमा सलाहकार ,शनि, बुध , और 8 th हाउस
6. होटल ,मंगल , शुक्र , चंद्रमा , 4th हाउस
7. बैंकर ,गुरु , बुध
8. एमबीए, सूर्य , गुरु , मंगल, बुध
9. रियल स्टेट एक्सपर्ट, मंगल ग्रह , गुरु , शुक्र , बुध
10 हाइपर स्टोर, मंगल ग्रह ,गुरू , शुक्र , 2 nd हाउस
कला वि:षयों :मुख्य significator शुक्र ग्रह ;
1. अधिवक्ता (कानून): बुध , गुरु , मंगल , शनी और 3rd हाउस
2. शिक्षा (बी.एड.): गुरु , बुध , सूर्य और 4 th हाउस
3. मीडिया : गुरु , बुध , शुक्र और 3th हाउस
4. विज्ञापन :गुरु , बुध ,7, 3 हाउस
5. समाज कल्याण :(एनजीओ) चंद्रमा , शुक्र , गुरु और 11 वीं हाउस
6. निजी सचिव: बुध , मंगल, गुरु और 3 rd हाउस
7. फ्रंट एंड मैनेजमेंट: बुध , गुरु और 3rd हाउस
8. फोटोग्राफर: सूर्य , शुक्र , चंद्रमा
9. फिल्म और संगीत कैरियर:शुक्र , बुध ,गुरु व 5 th हाउस
10 डेयरी उत्पादन एवं मैनेजमेंट: शुक्र , चंद्रमा , मंगल और 6 th हाउस
11.Textile डिजाइनिंग :शुक्र , बुध , चंद्रमा व 5th हाउस
12. उद्यमिता Entrepreneurshipएवं मैनेजमेंट :गुरु , बुध , मंगल, 7th हाउस
13. पर्यटन और एयरलाइन मैनेजमेंट : शुक्र , बुध , 9 एवं (3,7,11) हाउस
14. खाद्य विज्ञान एवं गुणवत्ता :गुरु , मंगल
15. परिधान प्रोड और एक्सपोर्ट : शुक्र , बुध , मंगल 9 वीं और 7 वीं हाउस
16. विदेशी भाषा :केतु , बुध , गुरु
17. कर्रिएर इन स्पोर्ट्स :मंगल ,गुरु ,सुर्य ,शुक्र और 5th हाउस
18. राजनीति शास्त्र :गुरु,शुक्र
19. गहने डिजाइन :,शुक्र , बुध ,गुरु ,मंगल व 5 th हाउस
20. निजी खुफिया कैरियर:शनि , बुध
नौकरी कौन सी होगी वह 10th हाउस पर निर्भर करती है:
10 वीं हाउस के मुख्य significator:कारक :
10 वीं हाउस मै बैठे ग्रह का प्रभाव :
विषय के प्रकार :मुख्य significator ग्रह:
1Engineering मुख्य ग्रह (शनि और मंगल)
2. इलेक्ट्रोनिक इंजी :सूर्य , बुध गुरु , मंगल और3rd हाउस
3. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग: बुध , मंगल, गुरु
4. मैक् इंजीनियरिंग: बुध , मंगल , शनि
5. केमिकल इंजीनियरिंग: शुक्र , चंद्रमा
6. खनन इंजीनियरिंग : शनि , बुध , मंगल
7. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग: शुक्र , मंगल
8. एयर -कंडीशन इंजी :शनि , मंगल
9. स्टील इंजी: शनि , मंगल
10 पेट्रो केमिकल :चंद्रमा , शनि, मंगल, सूर्य
11. एविएशन इंजी :शुक्र , मंगल , बुध और सूर्य , (3,7,11) हाउस
जातक के शिक्षा योग कैसे हैं? यह एक सहज जिज्ञासा होती है जिसके बारे में जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव के अधिपति की स्थिति से सहज ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है. यानि चतुर्थेश कुंडली के जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार परिणाम प्राप्त होते हैं. नीचे हम सभी भावों की स्थिति के अनुसार फ़ल बता रहे हैं.
प्रथम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के प्रथम भाव में बैठा हो तो जातक जीवन में अच्छी विद्या प्राप्त करता है जो उसको लाभदायक रहती है.
द्वितीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के द्वितीय भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक विद्या अवश्य प्राप्त करता है भले ही उसके पालकों की आर्थिक हैसियत उसे पढाने लायक ना हो तो भी.
तृतीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के तृतीय भाव में बैठा हो तो जातक की विद्या प्राप्त करने में उसकी माता की विशेष भूमिका होती है. माता की मेहनत से ऐसा जातक शिक्षा प्राप्त कर लेता है.
चतुर्त भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के चतुर्थ भाव में ही बैठा हो तो ऐसा जातक बहुत ही उत्तम विद्या प्राप्त करता है.
पंचम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के पंचम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक प्रकार की बाधाओं के साथ विद्या प्राप्त करता है और जातक अपने जीवन में ऐसी विद्या का कोई उपयोग नही कर पाता है.
षष्ठ भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के षष्ठ भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को विद्याध्ययन में बहुत अडेचने आती हैं परंतु उसे विद्या लाभकारी होती है.
सप्तम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के सप्तम भाव में बैठा हो तो और ऐसे जातक की विद्या २२ साल की उम्र के पहले पूर्ण हो जाती है और उससे जातक लाभ प्राप्त करता है. यदि २२ साल की उम्र के पहले विवाह हो जाये तो उसकी विद्या प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं.
अष्टम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के अष्टम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को मातृ सुख में कमी होती है और मातृ सुख के अभाव वश विद्या में न्युनता.
नवम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के नवम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक प्रचारक, आलोचक, एवम शिक्षक होता है चाहे पूरी विद्या प्राप्त की हो या नही.
दशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के दशम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को स्कूल जाने में डर लगता है और विद्या में कमी रहती है. ऐसा जातक अपने पिता का कार्य संभालता है.
एकादशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के एकादश भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक रूकावटों के साथ विद्या प्राप्त करता है.
द्वादश भाव - ऐसा जातक घर के बाहर रहकर विद्या प्राप्त करता है. ऐसा जातक पढे तो पूरा पढे वर्ना एकांत में बैठा विद्या प्राप्त करने के सपने लेने वाला होता है.

Tuesday, January 28, 2020

इत्र मोहनी

मोहिनी वशीकरण इत्र प्रयोग

मोहनी प्रयोग द्वारा किसी को भी अपने वश में इत्र के जरिए किया जाता है इसमें मंत्रो द्वारा इनको अभिमंत्रित कर इसका प्रयोग लोगों को सम्मोहित करने के लिए करते हैं और यह बहुत ही प्रभावकारी प्रयोग  है पर ध्यान रहे यदि कोई त्रुटि हुई तो प्रयोग कार्य नहीं करेगा इसका उपयोग कभी भी गलत भावनाओं के वशीभूत होकर नहीं करना चाहिए

साधना विधि 

इस साधना को करने के लिए सर्वप्रथम बाजार से कोई स्वर्ण सर्वोत्तम इत्र की शीशी ले आए और उसे पूजा स्थल पर रख दे और किसी शुक्रवार को  सुबह सूर्योदय से पहले  स्नान कर स्वच्छ हो होकर 108 बार मंत्र पढ़कर इत्र में एक बार फूंक मारे  इसी तरह आपको यह क्रिया  10 बार करनी है  अर्थात आपको 10 बार आपको  इत्र में फूंक मारनी है  और उसके बाद उस इत्र को किसी स्वच्छ जगह रख दे और कुछ समय बाद आप देखेंगे कि इत्र अपनी शीशी में ऊपर नीचे हो रहा है या सिद्ध करता है की इत्र अब अभिमंत्रित हो गया है और यह सम्मोहित करने के लिए प्रयुक्त हो गया जाएगा, फिर इस इत्र को आप जिस भी स्त्री या पुरुष के कपड़े में  लगा देंगे वह आपके वशीभूत हो जाएगा यदि आप  किसी स्त्री को  इस इत्र को  सूघा देते हैं  तो वह स्त्री तुरंत आपके वश में हो जाएगी और आपके  बातों का  पालन करने लगेगी  पर ध्यान रहे की इत्र का प्रयोग गलत भावनाओं या स्वयं हित में नहीं करना चाहिए

मंत्र

अलहम्दोगवानी  हो दीवानी जो न हो दीवानी सैयदः कादऱ अब्दुल् जलानी चुट्ट पकड़कर दिवानी

हर हर गंगे

Wednesday, January 1, 2020

पुंसवन संस्कार

16_संस्कारो_का_विज्ञान 

प्राचीनकाल में यह महान दायित्व कुटुम्बियों के साथ-साथ संत, पुरोहित और परिव्राजकों को सौंपा गया था। वे आने वाली पीढ़ियों को सोलह अग्नि पुटों से गुजार कर खरे सोने जैसे व्यक्तित्व में ढालते थे। इस परम्परा का नाम ही संस्कार परम्परा है।

------------------ #सीमन्तोन्नयन_संस्कार -------------------

सीमन्तोन्नयन संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है, इसका शाब्दिक अर्थ है- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना', इस संस्कार के तहत पति अपनी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया,
इस संस्कार को गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है, यह एक प्रकार से गर्भ की शुद्धि प्रक्रिया है,
इस दौरान बच्चे का दिमाग और दिल विकसित हो रहा होता है, यदि मां ऐसे वातावरण में रहती है जहां अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म किए जाते हैं, तो निश्चित ही शिशु के मतिष्क और रूप पर उसका सकारात्मक असर होता है।गर्भस्थ शिशु के शारीरिक विकास के लिए जहाँ ‘पुंसवन' संस्कार है वही गर्भ में पल रहे बच्चे के मानसिक विकास के लिए ‘सीमन्तोन्नयन’ संस्कार का विधान है, बालक के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए सूत्रों और चरक आदि सहिंताओं में माता के आहार और विहार के बहुत से नियम बताए गए हैं।

#इसका_वैज्ञानिक_दृष्टिकोण - गर्भवती महिलाएं अगर गर्भकाल के दौरान जंक फूड का सेवन करती हैं तो इससे होने वाले बच्चे पर भी असर पड़ता है। उनके बच्‍चों के भी ऐसे ही खान-पान का आदि बनकर मोटापे का शिकार बनने की आशंका बढ़ जाती है। यह तथ्य एडिलेड विश्वविद्यालय के शोध में सामने आया है।एडिलेड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. बेवर्ली मलहॉज्लर कहते है कि, “गर्भवती महिलाओं में बढ़ते मोटापे के कारण मोटापे और पाचन संबंधी बीमारियों का एक पीढ़ी दर पीढ़ी चक्र या कायम होने लगा है। संक्षेप में कहें तो, हम ऐसी माताओं को देख रहे हैं जो वजनदार संतान जन्म दे रही हैं जो आगे जाकर मोटे और कमजोर पाचनशक्ति वाले बन रहे हैं।“ इस शोध में यह पता चला कि गर्भावस्था के दौरान जो महिलाएं गलत भोजन करती हैं वे अपनी होने वाली संतान की पाचन क्रिया में भी बदलाव की स्थिति बनाती हैं और यह बच्चे बड़े होने पर आवश्यकता से अधिक भोजन करने के आदि होने लगते हैं। साथ ही इस कारण बच्चों के स्वाद में भी फेरबदल होता है जो सिर्फ चर्बीयुक्त और अधिक मीठा भोजन करना ही पसंद करते हैं।

#इस_संस्कार_अनुसार - 
सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है। आयुर्वेद के आचार्य सुश्रुत के अनुसार छठे महीने में गर्भवती को गोक्षुर (गोखरू) में पकाए घी और यवागू का सेवन करना चाहिए । आचार्य चरक के अनुसार इस महीने में मधुर गण की औषधियों से दूध को सिद्ध करके उसमे से निकाले गए घी का सेवन करना चाहिए ,वहीँ भावप्रकाश के अनुसार पृश्निप्रणी , सहिजन, गोक्षुर एवं गंभारी में से उपलब्ध किसी भी औषधि के कल्क के साथ दूध का सेवन करना चाहिए । आयुर्वेदानुसार सातवे महीने में भी छठे महीने की तरह दूध के साथ घी का सेवन करना चाहिए | भावप्रकाश ने सातवें महीने में कमालविस, द्राक्षा, कसेरू, मुलेठी और मिश्री इन सभी औषधियों में से उपलब्ध औषधियों के कल्क का सेवन दूध के साथ करना चाहिए ।
आठवें महीने में आचार्य सुश्रुत ने बिल्व के काढ़े में वातहर एवं स्निग्ध द्रव्यों का सेवन करना चाहिए । इस महीने में बिल्व के क्वाथ में बला, अतिबला, नमक, शहद, दूध या घी को मिलाकर गर्भिणी को सेवन करना चाहिए | इससे गर्भिणी के पुराने मल का शोधन होता है एवं वायु का अनुलोमन होता है । इन औषधियों के सेवन पश्चात दूध एवं मधुर गण की औषधियों से तैयार तैल से अनुवासन बस्ती दी जानी चाहिए ।

सीमन्तोन्नयन संस्कार वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हर कसौटी पर बिल्कुल खरा है , जो आज का विज्ञान रिसर्च कर रहा है ढूंढ रहा है वो सदियो से लोकोक्तियो में जीवित है और वैदिक साहित्य में धूल खा रहा है ।।

--------------------- #जातकर्म_संस्कार ----------------------
जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है, इसके लिए दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण तैयार होता है, जिसे घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है, इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।
इस पूरी प्रक्रिया में करीब 30 मिनिट का समय लगता है।
वैज्ञानिक भी मानते हैं बच्चे के जन्म के 30 ​मिनिट के भीतर उसे मां का दूध पिलाना चाहिए, जबकि, इस नियम को सदियों पहले ही सनातन धर्म में लिखा जा चुका है।

#विज्ञान - 
बच्चे को जन्म के तुरंत बाद रोना चाहिए। उसकी पीठ पर 2-3 बार धौल जमाएं। इसे साफ कपड़े में लपेट दें जिससे उसकी शक्ति का नुकसान न हो। सर्दियों में यह बेहद ज़रूरी होता है और यह उन बच्चों में और भी ज्यादा ज़रूरी होता है जो समय से पहले पैदा हो जाते हैं और बहुत कमज़ोर होते हैं। हवा का मार्ग साफ कर दें। इसके लिए प्लास्टिक के आईवी सेट (रोगाणुमुक्त) से गले के अंदर का पदार्थ चूस (खींच) कर निकाल दें। नाड़ को काट कर बांध दें। हर बार एक नया ब्लेड इस्तेमाल करें। नाड़ की मरहम पट्टी करने की ज़रूरत नहीं होती।साफ मुलायम कपड़े से बच्चे की ऑंखें पोछ दें। ऑंखों की संक्रमण बिमारीयो से बचाने के लिए ऑंखों को साफ रखे ।जितनी जल्दी हो सके माँ से बच्चे को अपना दूध पिलाने को कहें। जन्म के पहले कुछ घंटों में ही। इससे और दूध बनने में मदद मिलती है। पहले 2-3 दिनों में निकलने वाला दूध गाढ़ा और काफी प्रोटीन वाला होता है। इसमें संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिपिण्ड भी होते हैं।
पहले दो दिनों में बच्चा हरी काली गाढ़ी टट्टी करता है। इसे बच्चे पर से तुरंत साफ कर दें। अगर यह टट्टी शरीर पर ही कहीं सूख जाए तो इससे बच्चे की कोमल त्वचा को नुकसान पहुँचता है।

#संस्कार - नाल काटने के तरीके का उल्लेख - 
जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। 
मुँह की सफाई शरीर की सफाई - 
इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। 
जन्म लेते ही माता को स्तनपान का आदेश - 
इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है। ( यह स्तनपान विज्ञान के अनुसार जन्म होने के आधे घंटे अन्तर्गत कराये जाने वाला स्तनपान है ।

आधुनिक विज्ञान में जो भी जन्म लेने के बाद कि वैज्ञानिक आधार पर क्रियाएं है वही क्रियाएं हजारो सालो पहले से सनातन संस्कृति में उपलब्ध है लेकिन हम पिछड़े लोग है हमे सिर्फ पश्चिमी ठप्पा लगा ही चाहिए भले ही वो यही से चोरी किया हो ।।

#विशेष - 
संस्कार का व्युत्पत्तिपरक अर्थ- सम् पूर्वक कृञ् धातु से घञ् प्रत्यय होकर संस्कार शब्द निष्पन्न होता है। जिसका अर्थ है- संस्करणं सम्यक्करणं वा संस्कारः अर्थात् परिष्कार करना अथवा भली प्रकार निर्माण करना ’ संस्कार’ है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने मनुष्य की अन्तःभूमि को श्रेष्ठता की दिशा में विकसित करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है, जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं, सूक्ष्म अन्तःकरण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है। परिवार को संस्कारवान् बनाने की, कौटुम्बिक जीवन को सुविकसित बनाने की, एक मनोवैज्ञानिक एवं धर्मानुमोदित प्रक्रिया को संस्कार पद्धति कहा जाता है। हर्षोल्लास के वातावरण में देवताओं की साक्षी, अग्निदेव का सान्निध्य, धर्म- भावनाओं से ओत- प्रोत मनोभूमि, स्वजन- सम्बन्धियों की उपस्थिति, पुरोहित द्वारा कराया हुआ धर्म कृत्य, यह सब मिल- जुलकर संस्कार से सम्बन्धित व्यक्तियों को एक विशेष प्रकार की मानसिक अवस्था में पहुँचा देते हैं और उस समय जो प्रतिज्ञाएँ की जाती हैं, जो प्रक्रियाएँ कराई जाती हैं, वे अपना गहरा प्रभाव सूक्ष्म मन पर छोड़ती हैं और वह प्रभाव बहुधा इतना गहरा एवं परिपक्व होता है कि उसकी छाप अमिट नहीं, तो चिरस्थायी अवश्य बनी रहती है।

Wednesday, December 11, 2019

कुण्डली में पागल होने के कुछ योग

🌞कुंडली में पागल होने के योग🌞

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पागल होने के योग बन रहे हैं तो ऐसे लोगों को सावधान रहने की आवश्यकता होती है। ऐसे योग के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बताए गए उपाय अपनाने चाहिए।पागलपन की बीमारी किसी को बचपन से ही रहती है तो किसी को बड़ी उम्र में इस परेशानी का सामना करना पड़ता है। ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष योग होते हैं जो पागलपन की संभावना बताते हैं-

🔰पागलपन के योग-🔰

- यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र, बुध की युति केंद्र स्थान में हो अथवा यह दोनों ग्रह लग्र भाव में स्थित हो तो व्यक्ति उन्मादी या अल्पबुद्धि वाला हो सकता है।

- भाग्य एवं संतान भाव में सूर्य-चंद्र हो तो व्यक्ति का मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता।

- गुरु और शनि केंद्र में स्थित हो और शनिवार या मंगलवार का जन्म हो तो व्यक्ति पागल हो सकता है।

- यदि मंगल सप्तम स्थान में तथा लग्र में गुरु हो तो व्यक्ति किसी सदमे से पागल हो जाता है।

- यदि कमजोर चंद्र, शनि के साथ द्वादश भाव में युति करता है तो जातक पागल हो जाता है।

- मंगल, पंचम, सप्तम, नवम भाव में हो तो भी जातक पागल हो सकता है।

- कमजोर बुध केंद्र में या लग्र में बैठा हो तो वह व्यक्ति मंदबुद्धि होता है।

इन सभी योगों के साथ ही कुंडली के अन्य योगों और ग्रहों की स्थिति का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। कुछ परिस्थितियों में दूसरों ग्रहों के प्रभाव ये अशुभ फल स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। पूर्ण कुंडली का अध्ययन करने पर ही सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।

🔯पागलपन से बचने के कुछ उपाय-🔯

- गौमूत्र का सेवन करें। 

- बुध के मंत्रों का जाप करें।

- प्रतिदिन शिवजी की विधि-विधान से पूजा करें।

- बुधवार के दिन गाय को चारा खिलाएं।

- प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें।

- बुधवार को गणेशजी को दूर्वा और लाल फूल अर्पित करें।

- किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी से परामर्श लेकर अशुभ योगों का ज्योतिषीय उपचार करवाना चाहिए।

Monday, December 9, 2019

व्यवसाय के लिए राशि नाम

व्यवसाय के लिये राशि नाम एवं जन्म राशि का महत्त्व

जन्म नाम को कई प्रकार से रखा जाता है,भारत में जन्म नाम को चन्द्र राशि से रखने का रिवाज है,चन्द्र राशि को महत्वपूर्ण इसलिये माना जाता है कि शरीर मन के अनुसार चलने वाला होता है,बिना मन के कोई काम नही किया जा सकता है यह अटल है,बिना मन के किया जाने वाला काम या तो दासता में किया जाता है या फ़िर परिस्थिति में किया जाता है। दासता को ही नौकरी कहते है और परिस्थिति में जभी काम किया जाता है जब कहीं किसी के दबाब में आकर या प्रकृति के द्वारा प्रकोप के कारण काम किया जाये। जन्म राशि के अनुसार चन्द्रमा का स्थान जिस राशि में होता है,उस राशि का नाम जातक का रखा जाता है,नामाक्षर को रखने के लिये नक्षत्र को देखा जाता है और नक्षत्र में उसके पाये को देखा जाता है,पाये के अनुसार एक ही राशि में कई अक्षरों से शुरु होने वाले नामाक्षर होते है। राशि का नाम तो जातक के घर वाले या पंडितों से रखवाया जाता है,लेकिन नामाक्षर को प्रकृति रखती है,कई बार देखा जाता है कि जातक का जो नामकरण हुआ है उसे कोई नही जानता है,और घर के अन्दर या बाहर का व्यक्ति किसी अटपटे नाम से पुकारने लग जाये तो उस नाम से व्यक्ति प्रसिद्ध हो जाता है। यह नाम जो प्रकृति के द्वारा रखा जाता है,ज्योतिष में अपनी अच्छी भूमिका प्रदान करता है। अक्सर देखा जाता है कि कन्या राशि वालों का नाम कन्या राशि के त्रिकोण में या लगन के त्रिकोण में से ही होता है,वह जातक के घर वालों या किसी प्रकार से जानबूझ कर भी नही रखा गया हो लेकिन वह नाम कुंडली बनाने के समय त्रिकोण में या नवांश में जरूर अपना स्थान रखता है। मैने कभी कभी किसी व्यक्ति की कुंडली को उसकी पचास साल की उम्र में बनाया है और पाया कि उसका नाम राशि या लगन से अथवा नवांश के त्रिकोण से अपने आप प्रकृति ने रख दिया है। कोई भी व्यवसाय करने के लिये नामाक्षर को देखना पडता है,और नामाक्षर की राशि का लाभ भाव का दूसरा अक्षर अगर सामने होता है तो लाभ वाली स्थिति होती है,अगर वही दूसरा अक्षर अगर त्रिक भावों का होता है तो किसी प्रकार से भी लाभ की गुंजायस नही रहती है। उदाहरण के लिये अगर देखा जाये तो नाम "अमेरिका" में पहला नामाक्षर मेष राशि का है और दूसरा अक्षर सिंह राशि का होने के कारण पूरा नाम ही लाभ भाव का है,और मित्र बनाने और लाभ कमाने के अलावा और कोई उदाहरण नही मिलता है,उसी प्रकार से "चीन" शब्द के नामाक्षर में पहला अक्षर मीन राशि का है और दूसरा अक्षर वृश्चिक राशि का होने से नामानुसार कबाड से जुगाड बनाने के लिये इस देश को समझा जा सकता है,वृश्चिक राशि का भाव पंचमकारों की श्रेणी में आने से चीन में जनसंख्या बढने का कारण मैथुन से,चीन में अधिक से अधिक मांस का प्रयोग,चीन में अधिक से अधिक फ़ेंकने वाली वस्तुओं को उपयोगी बनाने और जब सात्विकता में देखा जाये तो वृश्चिक राशि के प्रभाव से ध्यान समाधि और पितरों पर अधिक विश्वास के लिये मानने से कोई मना नही कर सकता है। उसी प्रकार से भारत के नाम का पहला नामाक्षर धनु राशि का और दूसरा नामाक्षर तुला राशि का होने से धर्म और भाग्य जो धनु राशि का प्रभाव है,और तुला राशि का भाव अच्छा या बुरा सोचने के बाद अच्छे और बुरे के बीच में मिलने वाले भेद को प्राप्त करने के बाद किये जाने वाले कार्यों से भारत का नाम सिरमौर रहा है। इसी तरह से अगर किसी व्यक्ति का नाम "अमर" अटल आदि है तो वह किसी ना किसी प्रकार से अपने लिये लाभ का रास्ता कहीं ना कहीं से प्राप्त कर लेगा यह भी एक ज्योतिष का चमत्कार ही माना जा सकता है।अपने नाम के अनुसार किस प्रकार से व्यवसाय को चुना जावे अपने अपने नाम से व्यवसाय करने के लिये लोग तरह तरह के प्रयोग किया करते है,जैसे किसी के नाम के आगे एक ही राशि के दो अक्षर सामने आ जाते है तो वह फ़ौरन दूसरा शब्द उस नाम से लाभ लेने के लिये प्रयोग में ले आता है, एक नाम का उदाहरण है "एयरटेल" यह नाम अपने मे विशेषता लेकर चलता है,और इस नाम को भारतीय ज्योतिष के अनुसार प्रयोग करने के लिये जो भाव सामने आते है उनके आनुसार अक्षर "ए" वृष राशि का है और "य" वृश्चिक राशि का है,वृष से वृश्चिक एक-सात की भावना देती है,जो साझेदारी के लिये माना जाता है,इस नाम के अनुसार कोई भी काम बिना साझेदारी के नही किया जा सकता है,लेकिन साझेदारी के अन्दर भी लाभ का भाव होना जरूरी है,इसलिये दूसरा शब्द "टेल" में सिंह राशि का "ट" प्रयोग में लिया गया है,एक व्यक्ति साझेदारी करता है और लाभ कमाता है,अधिक गहरे में जाने से वृष से सिंह राशि एक चार का भाव देती है,लाभ कमाने के लिये इस राशि को जनता मे जाना पडेगा,कारण वृष से सिंह जनता के चौथे भाव में विराजमान है।

कैसे रखें प्रतिष्ठान का नाम

किसी भी फर्म कारखाना दुकान या किसी भी संस्था का नाम उसका मुकुट या बीजारोपण होता है जब हम किसी पेड़ को लगाते है तो सही भूमि सही समय का चयन करते है।इसके बाद वह पेड़ फलता फूलता है तब हम उसकी शीतल छांव मे आश्रय लेते है उसके फल खाते है।इसी तरह फर्म के नामकरण के समय सभी सदस्यों की पत्रिका अपनी कुल की परम्परा अपने कुल के देव कुल का हानि लाभ भाग्यवर्धक दिशा का चयन करना चाहिये।जिस स्थान मे फर्म डाल रहे है उस स्थान की भूमि कैसी है उसके वास्तुदोष का भी निराकरण करना चाहिये।

भाग्यवर्धक नामअक्षर

जिस तरह मां सभी को पालती है उसी तरह फर्म भी सभी का पोषण करती है इसके साथ सभी लोगों को भाग्य जुड़ा रहता है।इसिलिये अच्छी तरह से सोच समझकर पंजीकरण किया गय़ा नाम आपके भाग्य को बुलंदियों पर पहुँचाता है।

भाग्यवर्धक नाम अक्षर का राशि के अनुसार चुनाव 

मेष  इस राशि वालों को म,ध,अ ,ह ये नाम भाग्यवर्धक रहेंगे।
वृषभ  इस राशि के लिये प,ज ,व का नाम भाग्यवर्धक रहेगा।
मिथुन  इस राशि वालों को क,र,स ये नाम शुभ रहेंगे।
कर्क  इस राशि के लिये ह,न,ज,द अक्षर शुभ रहेंगे।
सिंह  इस राशि के लिये म,ध,अ अक्षर शुभ रहेंगे।
कन्या  इस राशि के लिये प,ज,द,व अक्षर भाग्यशाली रहेंगे।
तुला  इस राशि वालों को र,स,क इन नाम अक्षर से शुभ परिणाम प्राप्त होंगे।
वृश्चिक  इस राशि वालों को द,ह,न ये नाम शुभ परिणाम दायक रहेंगे।
धनु  इस राशि वालों को अ,म,क नाम शुभ रहेंगे।
मकर  इस राशि वालों को प,व,र ये नाम शुभ परिणाम दायक रहेंगे।
कुम्भ इनके लिये र,म,क ये नाम शुभ है।
मीन इनके लिये ह,न,प ये नाम परम शुभ रहेंगे। 

दुकान,संस्थान,उद्योग का नामकरण आपके आर्थिक हित तथा अन्य लोगो से जुड़े संस्थान के नामकरण मॆ विशेष सावधानी बरतनी चाहिये.इनके नामकरण मॆ चतुर्थ,भाग्य तथा शनि की अनुकूल स्थिति आपको विशेष लाभ देगी.कोई भी नामकरण कोई मामूली नही विशेष महत्वपूर्ण है।

Monday, December 2, 2019

धनवान बनने के योग

🏵️ ।।धनवान बनने का योग ।।🏵️

यदि आप धनवान बनने का सपना देखते हैं, तो अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें।

१ यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है।

२ मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है।

३ जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है।

४ शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं।

५ जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं।

६ दूसरे भाव का स्वामी यदि ८ वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है।

७ यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है।

८ सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने।

९ छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है।

१० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है।

११ मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है।

१२ गुरु जब कर्क, धनु या मीन राशि का और पांचवे भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति पुत्र और पुत्रियों के द्वारा धन लाभ पाता है।

१३ राहू, शनि या मंगल और सूर्य ग्यारहवें भाव में हों तब व्यक्ति धीरे-धीरे धनपति हो जाता है।

१४ बुध, शुक और शनि जिस भाव में एक साथ हो वह व्यक्ति को व्यापार में बहुत ऊंचाई देकर धनकुबेर बनाता है

१५ दसवें भाव का स्वामी वृषभ राशि या तुला राशि में और शुक्र या सातवें भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति को विवाह के द्वारा और पत्नी की कमाई से बहुत धन लाभ होता है।

१६ शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है, तब आंकिक योग्यता जैसे अकाउण्टेट, गणितज्ञ आदि बनकर धन अर्जित करता है।

१७ बुध, शुक्र और गुरु किसी भी ग्रह में एक साथ हो तब व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धनवान होता है। जिनमें पुरोहित, पंडित, ज्योतिष, प्रवचनकार और धर्म संस्था का प्रमुख बनकर धनवान हो जाता है।

१८ कुण्डली के त्रिकोण घरों या चतुष्कोण घरों में यदि गुरु, शुक्र, चंद्र और बुध बैठे हो या फिर ३, ६ और ग्यारहवें भाव में सूर्य, राहू, शनि, मंगल आदि ग्रह बैठे हो तब व्यक्ति राहू या शनि या शुक या बुध की दशा में अपार धन प्राप्त करता है।

१९ गुरु जब दसर्वे या ग्यारहवें भाव में और सूर्य और मंगल चौथे और पांचवे भाव में हो या ग्रह इसकी विपरीत स्थिति में हो व्यक्ति को प्रशासनिक क्षमताओं के द्वारा धन अर्जित करता है।

२० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में केतु को छोड़कर अन्य कोई ग्रह बैठा हो, तब व्यक्ति व्यापार-व्यवसार द्वारा अपार धन प्राप्त करता है। यदि केतु ग्यारहवें भाव में बैठा हो तब व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन प्राप्त करता है।