Tuesday, April 15, 2014

क्या है ज्योतिष और भाग्य का सम्बन्ध

क्या है ज्योतिष और भाग्य का सम्बन्ध...?
आप सभी जानते हें और वेदों में
भी लिखा है----
"भाग्यं फलति सर्वत्र न विधा न च पौरूषम
शुराग कृ्त विद्याश्च:,वने तिष्ठंति मे सुता: "
पांडवों की माता कुन्ती श्रीकृ्ष्ण
से कहती है कि मेरा पुत्र
महापराक्रमी एवं विद्वान है किन्तु हम लोग फिर
भी वनों में भटकते हुए जीवन गुजार
रहे हैं,क्यों कि भाग्य सर्वत्र फल देता है ।
भाग्यहीन व्यक्ति की विद्या और
उसका पुरूषार्थ निरर्थक है ।
वैसे देखा जाए तो भाग्य एवं पुरूषार्थ
दोनों का ही अपना-अपना महत्व है, लेकिन
इतिहास पर दृ्ष्टि डाली जाए तो सामने
आएगा कि जीवन में पुरूषार्थ
की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण है। भाग्य की कुंजी सदैव
हमारे कर्म के हाथ में होती है, अर्थात कर्म
करेंगे तो ही भाग्योदय होगा। जब कि पुरूषार्थ इस
विषय में पूर्णत: स्वतंत्र है ।
माना कि पुरूषार्थ सर्वोपरी है किन्तु इतना कहने
मात्र से भाग्य की महता तो कम
नहीं हो जाती ।
आप देख सकते हैं कि दुनिया में ऎसे मनुष्यों की कोई
कमी नहीं है जो कि दिन रात मेहनत
करते हैं, लेकिन फिर
भी उनका सारा जीवन अभावों में
ही व्यतीत हो जाता है । अब इसे
आप क्या कहेंगें ? उन लोगों नें पुरूषार्थ करने में तो कोई
कमी नहीं की फिर उन
लोगों को वो सब सुख सुविधाएं क्यों नहीं मिल पाई
जो कि आप और हम भोग रहे हैं । एक इन्सान
इन्जीनियरिंग/डाक्टरी/मैनेजमेन्ट
की पढाई करके भी नौकरी के
लिए मारा मारा फिर रहा है, लेकिन उसे कोई
चपरासी रखने को भी तैयार
नहीं, वहीं दूसरी ओर एक
कम पढा लिखा इन्सान किसी काम धन्धे में लग कर
बडे मजे से अपने परिवार का पेट पाल रहा है । अब इसे आप
क्या कहेंगें ?
एक मजदूर जो दिन भर भरी दुपहर में पत्थर तोडने
का काम करता है--क्या वो कम पुरूषार्थ कर रहा है ?
अब कुछ लोग कहेंगें कि उसका वातावरण, उसके हालात,
उसकी समझबूझ इसके लिए दोषी है
ओर या कि उसमें इस तरह की कोई
प्रतिभा नहीं है कि वो अपने जीवन
स्तर को सुधार सके अथवा उसे जीवन में ऎसा कोई
उचित अवसर नहीं मिल
पाया कि वो जीवन में आगे बढ सके या फिर उसमें
शिक्षा की कमी है आदि आदि...ऎसे
सैकंडों प्रकार के तर्क हो सकते हैं ।
मैं मानता हूँ कि इस के पीछे जरूर उसके हालात,
वातावरण, शिक्षा दीक्षा,
उसकी प्रतिभा इत्यादि कोई भी कारण
हो सकता है लेकिन ये सवाल फिर भी अनुतरित रह
जाता है कि क्या ये सब उसके अपने हाथ में था ?
यदि नहीं तो फिर कौन सा ऎसा कारण है कि उसने
किसी अम्बानी, टाटा-बिरला के घर जन्म न
लेकर एक गरीब के घर में जन्म लिया। है
किसी तर्कवादी के पास इस बात
का उत्तर?
ये निर्भर करता है इन्सान के भाग्य पर---जिसे चाहे तो आप
luck कह लीजिए या मुक्कदर या किस्मत या फिर
कुछ भी । यह ठीक है कि इन्सान
द्वारा किए गए कर्मों से ही उसके भाग्य का निर्माण
होता है । लेकिन कौन सा कर्म, कैसा कर्म और किस दिशा में
कर्म करने से मनुष्य अपने भाग्य का सही निर्माण
कर सकता है---ये जानने का जो माध्यम है,
उसी का नाम ज्योतिष है ।
जैसा की श्रीमद भागवत में
भी लिखा हें-----भाग्य
को बदला नहीं जा सकता ।
होइहि सोई जो राम रचि राखा , कों करि तरक
बारावाही साखा !
रामचरितमानस में तुलसी दास भी कहते
है, कि होता वही है , जो राम अर्थात ईश्वर ने
निर्धारित कर दिया है,इसलिए हमें व्यर्थ ही तर्क
नहीं करना चाहिए !
महर्षि वेदव्यास और तुलसीदास के इन
दोनों कथनों कि तुलना करे तो यही प्रतीत
होता है, कि मनुष्य के जीवन पर भाग्य
का ही प्रभाव होता है

No comments:

Post a Comment