Saturday, May 10, 2014

मानव जन्म और शरीर का रहस्य

रति क्रीड़ा के समय यदि पति के शुक्र
की मात्रा अधिक स्खलित होती है
तो पुरुष संतान
होती, पत्नी के श्रोणित
की मात्रा अधिक हो जाए
तो स्त्री संतान के रूप में गर्भ शिशु का विकास
होता है। अगर दोनों की मात्रा समान होकर पुरुष
शिशु का जन्म होता है तो वह नपुंसक होगा। गर्भ
धारण के रतिक्रीड़ा में स्खलित इंद्रियां गर्भ-
कोशिका में एक गोल बिंदु या बुलबुला उत्पन्न
करता है।
इसके बाद पंद्रह दिनों के अंदर उस बिंदु के साथ
मांस सम्मिलित होकर विकसित होता है। फिर
क्रमश:
इसकी वृद्धि होती जाती है।
एक महीने के
पूरा होते-होते उस पिंड से पंच तत्वों का संयोग
होता है। दूसरे महीने पिंड पर चर्म
की परत जमने
लगती है। तीसरे महीने में
नसें निर्मित होती हैं।
चौथे महीने में रोम, भौंहें, पलकें आदि का निर्माण
होता है।
पांचवें महीने में कान, नाक, वक्ष; छठे
महीने में
कंठ, सिर और दांत तथा सातवें महीने में यदि पुरुष
शिशु हो तो पुरुष-चिह्न्, स्त्री शिशु
हो तो स्त्री-
चिह्न् का निर्माण होता है। आठवें महीने में
समस्त
अवयवों से पूर्ण शिशु का रूप बनता है।
उसी स्थिति में उस शिशु के भीतर
जीव या प्राण
का अवतरण होता है। नौवें महीने में
जीव सुषुम्न
नाड़ी के मूल से पुनर्जन्म कर्म का स्मरण करके
अपने इस जन्म धारण पर रुदन करता है। दसवें
महीने में पूर्ण मानव की आकृति में
माता के गर्भ से
जन्म लेता है।
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान-ये पांच
'प्राण वायु' कहलाते हैं। इसी प्रकार नाग, कर्म,
कृकर, देवदत्त और धनंजय नामक अन्य पांच वायु
भी हैं। इस शरीर में शुक्ल, अस्थियां,
मांस, जल,
रोम और रक्त नामक छह कोशिकाएं हैं। नसों से
बंधित इस स्थूल शरीर में चर्म, अस्थियां, केश,
मांस और नख-ये क्षिति या पृथ्वी से सम्बंधित
गुण हैं।
मुंह में उत्पन्न होनेवाला लार, मूत्र, शुक्ल, पीव,
व्रणों से रिसनेवाला जल-ये आप यानी जल गुण हैं।
भूख, प्यास, निद्रा, आलस्य और कांति तेजोगुण हैं
यानी अग्नि गुण है। इच्छ, क्रोध, भय, लज्जा,
मोह, संचार, हाथ-पैरों का चालन,
अवयवों का फैलाना, स्थिर यानी अचल होना-ये
वायु गुण कहलाते हैं। ध्वनि भावना, प्रश्न, ये
गगन यानी आकाशिस्थ गुण है। कान, नेत्र,
नासिका, जिा, त्वचा, ये पांचों ज्ञानेंद्रिय हैं। इडा,
पिंगला और सुषुम्ना ये दीर्घ नाड़ियां हैं।
इनके साथ गांधारी, गजसिंह, गुरु,
विशाखिनी-
मिलकर सप्त नाड़ियां कहलाती हैं। मनुष्य जिन
पदार्थो का सवेन करता है उन्हें उपरोक्त वायु उन
कोशिकाओं में पहुंचा देती हैं। परिणामस्वरूम उदर में
पावक के उपरितल पर जल और उसके ऊध्र्व भाग
में खाद्य पदार्थ एकत्रित हो जाते हैं। इस
जटराग्नि को वायु प्रज्वलित कर देती है।
मानव शरीर का गठन अति विचित्र है। इस
शरीर में
साढ़े तीन करोड़ रोम, बत्तीस दांत,
बीस नाखून,
सत्ताईस करोड़ शिरोकेश, तीन हजार तोले के वजन
की मांसपेशियां, तीन सौ तोले वजन
का रक्त, तीस
तोले की मेधा, तीस तोले
की त्वचा, छत्तीस तोले
की मज्जा, नौ तोले का प्रधान रक्त और कफ, मल
व मूत्र-प्रत्येक पदार्थ नौ तोले के परिमाण में
निहित हैं। इनके अतिरिक्त अंड के भीतर
की सारी वस्तुएं शरीर के
अंदर समाहित हैं।
इसी प्रकार शरीर के भीतर
चौदह भुवन या लोक
निहित हैं- ये भुवन शरीर के विभिन्न अंगों के
प्रतीक हैं, जैसे-दायां पैर अतल नाम से व्यवह्रत
है, तो एड़ी वितल, घुटना सुतल, घुटने
का ऊपरी भाग यानी जांध रसातल, गुह्य
पाश्र्व
भाग तलातल, गुदा भाग महातल, मध्य भाग पाताल,
नाभि स्थल भूलोक, उदर भुवर्लोक, ह्रदय
सुवर्लोक, भुजाएं सहर्लोक, मुख जनलोक, भाल
तपोलोक, शिरो भाग सत्यलोक माने जाते हैं।
इसी प्रकार त्रिकोण मेरु पर्वत, अघ: कोण, मंदर
पर्वत, इन कोणों का दक्षिण पाश्र्व कैलाश वाम
पाश्र्व हिमाचल, ऊपरी भाग निषध पर्वत, दक्षिण
भाग गंधमादन पर्वत, बाएं हाथ की रेखा वरुण
पर्वत नामों से अभिहित हैं।
अस्थियां जम्बू द्वीप कहलाती हैं।
मेधा शाख द्वीप,
मांसपेशियां कुश द्वीप, नसें क्रौंच द्वीप,
त्वचा शालमली द्वीप, केश प्लक्ष
द्वीप, नख
पुष्कर द्वीप नाम से व्यवहृत हैं। जल
समबंधी मूत्र
लवण समुद्र नाम से पुकारा जाता है तो थूक क्षीर
समुद्र, कफ सुरा सिंधु समुद्र, मज्जा आज्य
समुद्र, लार इक्षु समुद्र, रक्त दधि समुद्र, मुंह में
उत्पन्न होनेवाला जल शुदार्नव नाम से जाने जाते
हैं।
मानव शरीर के भीतर लोक, पर्वत और
समुद्र
ही नहीं बल्कि ग्रह
भी चक्रों के नाम से समाहित
हैं। प्रधानत: मानव के शरीर में दो चक्र होते हैं-
नाद चक्र और बिंदु चक्र। नाद चक्र में सूर्य और
बिंदु चक्र में चंद्रमा का निवास होता है। इनके
अतिरिक्त नेत्रों में अंगारक, ह्रदय में बुध, वाक्य में
गुरु, शुक्ल में शुक्र, नाभि में शनि, मुख में राहू और
कानों में केतु निवास करते हैं। इससे स्पष्ट होता है
कि मनुष्य के भीतर भूमंडल और ग्रह मंडल
समाहित है। यही मानव जन्म और
शरीर का रहस्य
है।

No comments:

Post a Comment