रत्नराज पुखराज कौन धारण कर सकता है ?
अक्सर ज्योतिषी लोगों को पुखराज पहनने कि सलाह
दे देते हैं, यह कहकर कि अपार धन
कि वर्षा होगी, यद्यपि उन्होंने
उनकी जन्म कुण्डली का विश्लेषण
ना भी किया हो, फिर भी वह यह मान
के ये सलाह दे देते हैं, कि गुरु तो सुखकारक ग्रह है, वह
तो सदा ही कल्याण ही करेगा .. पर
क्या वास्तव में ही गुरु हर स्थिति में
कल्याणकारी ही होते हैं ?
यह बात बहुत ध्यान से समझने वाली और
अक्षरसः सही है कि गुरु जिस घर में
भी स्थित हो, उस घर के फल में तो न्यूनता लाता है,
पर जिन तीन घरों में
उसकी दृष्टि पड़ती है(गुरु अपने घर से
5वें, 7वें और 9वें भाव पर दृष्टि रखता है) उन घरों को शुभ फल
प्रदान करता है ।
यदि यह तीसरे भाव में यानि पराक्रम भाव में स्थित
है तो इसकी दृष्टि स्त्री भाव, भाग्य
भाव एवं आय भाव पर पड़ती है और इन
तीनों ही भाव के अच्छे हो जाने से अब
उस व्यक्ति को भला क्या कष्ट बचा ?? अतः वह पूर्ण
सुखी जीवन व्यतीत कर
सकेगा,पुखराज धारण करना उसे
धरती का सबसेसुखी प्राणी बना सकता है,
(गुरु शुभ भावों का स्वामी हो तो)..
वहीँ .. यदि गुरु चौथे सुख स्थान में बैठा हो, तो सुख
को तो ख़त्म
करेगा ही उसकी दृष्टि पड़ेगी अष्टम,
दशम और व्यय भाव पर । यानी वह
राज्योन्नत्ति तो भले ही कर दे पर अष्टम पर शुभ
दृष्टि पड़ने के कारण कष्ट में वृद्धि और व्यय पर दृष्टि के कारण
व्यय भी बढ़ा देगा । और यदि यह केंद्र स्थित गुरु
किसी अशुभ गृह जैसे 6th
का स्वामी हुआ तो शत्रु बढ़ जायेंगे, रोग होंगे ।
इसलिए पुखराज का धारणकर्ता रत्न धारण करने से पूर्व इन
बातों का अध्ययन करके पहले से ही सतर्क
हो जाये ।
शनि रत्न नीलम के लिए ठीक
इसका उल्टा होता है
अक्सर ज्योतिषी लोगों को पुखराज पहनने कि सलाह
दे देते हैं, यह कहकर कि अपार धन
कि वर्षा होगी, यद्यपि उन्होंने
उनकी जन्म कुण्डली का विश्लेषण
ना भी किया हो, फिर भी वह यह मान
के ये सलाह दे देते हैं, कि गुरु तो सुखकारक ग्रह है, वह
तो सदा ही कल्याण ही करेगा .. पर
क्या वास्तव में ही गुरु हर स्थिति में
कल्याणकारी ही होते हैं ?
यह बात बहुत ध्यान से समझने वाली और
अक्षरसः सही है कि गुरु जिस घर में
भी स्थित हो, उस घर के फल में तो न्यूनता लाता है,
पर जिन तीन घरों में
उसकी दृष्टि पड़ती है(गुरु अपने घर से
5वें, 7वें और 9वें भाव पर दृष्टि रखता है) उन घरों को शुभ फल
प्रदान करता है ।
यदि यह तीसरे भाव में यानि पराक्रम भाव में स्थित
है तो इसकी दृष्टि स्त्री भाव, भाग्य
भाव एवं आय भाव पर पड़ती है और इन
तीनों ही भाव के अच्छे हो जाने से अब
उस व्यक्ति को भला क्या कष्ट बचा ?? अतः वह पूर्ण
सुखी जीवन व्यतीत कर
सकेगा,पुखराज धारण करना उसे
धरती का सबसेसुखी प्राणी बना सकता है,
(गुरु शुभ भावों का स्वामी हो तो)..
वहीँ .. यदि गुरु चौथे सुख स्थान में बैठा हो, तो सुख
को तो ख़त्म
करेगा ही उसकी दृष्टि पड़ेगी अष्टम,
दशम और व्यय भाव पर । यानी वह
राज्योन्नत्ति तो भले ही कर दे पर अष्टम पर शुभ
दृष्टि पड़ने के कारण कष्ट में वृद्धि और व्यय पर दृष्टि के कारण
व्यय भी बढ़ा देगा । और यदि यह केंद्र स्थित गुरु
किसी अशुभ गृह जैसे 6th
का स्वामी हुआ तो शत्रु बढ़ जायेंगे, रोग होंगे ।
इसलिए पुखराज का धारणकर्ता रत्न धारण करने से पूर्व इन
बातों का अध्ययन करके पहले से ही सतर्क
हो जाये ।
शनि रत्न नीलम के लिए ठीक
इसका उल्टा होता है
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