Monday, April 14, 2014

कुण्डली बताती है, धरती पर जन्म लेने से पहले आप कहां थे


कुण्डली बताती है, धरती पर जन्म लेने से पहले आप कहां थे ? ज्योतिष में मरणोपरांत पुर्नजन्म एवं परलोक
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यह प्रकृति का नियम है कि जिनका जन्म होता है उन्हें एक दिन मरना भी होगा। अगर मुक्ति नहीं मिली तो वापस पृथ्वी पर आकर अपने कर्मों का फल फिर से भोगना पड़ेगा। इस तरह जीवन और मृत्यु का सिलसिला चलता रहता है।
लेकिन जीवन और मृत्यु के बीच में प्राण कहां रहता है यह जानने की चाहत हर व्यक्ति की होती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इसे जानना भी बहुत आसान है। जब व्यक्ति का जन्म होता है तब पूर्व जन्म से लेकर मृत्यु के बाद तक की सभी स्थितियों को भगवान ग्रहों एवं राशि के माध्यम से जन्मकुण्डली में निर्धारित कर देते हैं।
ज्योतिष में मरणोपरांत पुर्नजन्म एवं परलोक
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जीवात्मा एक देह से दूसरी देह में जन्म लेती है. शरीर का नाश होता है, आत्मा का नहीं. पुराणों के अनुसार मनुष्य पाप और पुण्य का फल भोगने के लिए ही पुनर्जन्म लेता है. पुराणों में भी भगवान विष्णु के दस मुखय अवतारों (पुनर्जन्म) की धारणा को स्वीकारा गया है. महर्षि पराशर के अनुसार सूर्य से राम, चंद्रमा से कृष्ण, मंगल से नरसिंह, बुध से भगवान बुद्ध, गुरु से वामन, शुक्र से परशुराम, शनि से कूर्म, राहु से वराह और केतु से मत्स्य अवतार हुए हैं. भगवान गौतम बुद्ध के बारे में कहा गया है कि उन्हें अपने पूर्व के 5000 जन्मों की स्मृति थी. मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार 84 लाख योनीयों में से किसी एक योनी में जन्म लेता है. मनुष्य के मन में यह जिज्ञासा रहती है कि मैं पूर्व जन्म में कौन था, किस योनी में था और कहां से आया हूं? इन सब प्रश्नों के उत्तर भारतीय ज्योतिष के द्वारा संभव है. जन्म कुंडली का पंचम भाव, पंचम भाव का स्वामी एवं पंचम भाव स्थित ग्रह व सूर्य और चंद्रमा में जो ग्रह बली हो उसकी द्रेष्काण में स्थिति, पुर्नजन्म के बारे में बताती है. महर्षि पराशर के ग्रंथ बृहतपराशर होरा शास्त्र के अनुसार जन्मकालिक सूर्य और चंद्रमा में से जो बली हो, वह ग्रह जिस ग्रह के द्रेष्काण में स्थित हो, उस ग्रह के अनुसार जातक का संबंध उस लोक से था. कुंडली के पंचम भाव के स्वामी ग्रह से जातक के पूर्वजन्म के निवास का पता चलता है.
पूर्नजन्म में जातक की दिशा : जन्म कुंडली के पंचम भाव में स्थित राशि के अनुसार जातक के पूर्वजन्म की दिशा का ज्ञान होता है.
पूर्नजन्म में जातक की जाति : जन्म कुंडली में पंचमेश ग्रह की जो जाति है, वही पूर्व जन्म में जातक की जाति होती है.
पूर्नजन्म के संकेत : मनुष्य की मृत्यु के समय जो कुंडली बनती है, उसे पुण्य चक्र कहते हैं. इससे मनुष्य के अगले जन्म की जानकारी होती है. मृत्यु के 13 दिन बाद उसका अगला जन्म कब और कहां होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. जातक-पारिजात में मृत्युपरांत गति के बारे में बताया गया है. यदि मरण काल में लग्न में गुरु हो तो जातक की गति देवलोक में, सूर्य या मंगल हो तो मृत्युलोक, चंद्रमा या शुक्र हो तो पितृलोक और बुध या शनि हो तो नरक लोक में जाता है. यदि बारहवें स्थान में शुभ ग्रह हो, द्वादशेश बलवान होकर शुभ ग्रह से दृष्टि होने पर मोक्ष प्राप्ति का योग होता है. यदि बारहवें भाव में शनि, राहु या केतु की युति अष्टमेश के साथ हो, तो जातक को नरक की प्राप्ति होती है. जन्म कुंडली में गुरु और केतु का संबंध द्वादश भाव से होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है.
जन्मपत्रिका और प्रेत आत्माओं का गहरा सम्बन्ध है। पत्रिाका में गुरु, शनि और राहू की स्थिति आत्माओं का सम्बन्ध पूर्व कर्म के कर्मो से प्राप्त फल या प्रभाव बतलाती है। शनि के पहे घर या बाद के घर में राहू की उपस्थिति या दोनों की युति और साथ में गुरु होने की दृष्टि या प्रभाव जातक पर प्रेत आत्माओं के प्रभाव को बढ़ा देता है।
गुरु, शनि, राहु किस प्रकार जन्म पत्रिाका को प्रभावित करते है, कुछ उदाहरण से देखें :-
1. गुरु यदि लग्न में होतो पूर्वजों की आत्मा का आशीर्र्वाद या दोष दर्शाता है। अकेले में या पूजा करते वक्त उनकी उपस्थिति का आभास होता है। ऐसे व्यक्ति कों अमावस्या के दिन दूध का दान करना चाहिए।
2. दूसरे अथवा आठवें स्थान का गुरु दर्शाता है कि व्यक्ति पूर्व जन्म में सन्त या सन्त प्रकृति का या और कुछ अतृप्त इच्छाएं पूर्ण न होने से उसे फिर से जन्म लेना पड़ा। ऐसे व्यक्ति पर अदृश्य प्रेत आत्माओं के आशीर्वाद रहते है। अच्छे कर्म करने तथा धार्मिक प्रवृति से समस्त इच्छाएं पूर्व होती हैं। ऐसे व्यक्ति सम्पन्न घर में जन्म लेते है। उत्तरार्ध में धार्मिक प्रवृत्ति से पूर्ण जीवन बिताते हैं। उनका जीवन साधारण परंतु सुखमय रहता है और अन्त में मौत को प्राप्त करते है।
3. गुरु तृतीय स्थान पर हो तो यह माना जाता है कि पूर्वजों में कोई स्त्री सती हुई है और उसके आशीर्वाद से सुखमय जीवन व्यतीत होता है

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