Tuesday, April 15, 2014

ग्रहो की युति का प्रभाव

ग्रहो की युति का प्रभाव (The impact of
planetary conjunction)
शास्त्री मोहनमुरारी जी कहते
हे
ग्रहण का वास्तबिक अर्थ है वस्तु (ग्रह) का आँखो से
ओझल हो जाना , यदि वस्तु पूरी तरह से अदृश्य
रहती है तो पूर्ण ग्रहण (Full eclipse)
कहालाता है, और आंशिक रूप से अदृश्य रहने पर आंशिक
ग्रहण( Partly eclipse) लगता है.
यदि हम ग्रहो की परिप्रेक्ष्य में देखें तो तो सूर्य
से बुध लगभग 360 लाख(3 करोड़ 60 लाख) मील
दूरी पर है, शुक्र 6 करोड़ 70 लाख
मील दूरी और पृथ्वी 9
करोड़ 30 लाख मील
की दुरी पर है.
चन्द्रमा पृथ्वी के चारो और परिक्रमा करता है,
तथा पृथ्वी से इसकी दूरी 2
लाख 40 हजार किलोमीटर है. इस प्रकार
चन्द्र्मा बुध, और शुक्र, सूर्य व पृथ्वी के
बीच में आ सकते है.
उसी प्रकार सूर्य से मंगल 14 करोड़ 20 लाख,
बृहस्पति 48 करोड़ 30 लाख तथा शनि लगभग 88 करोड़ 60
लाख मील दूरी पर स्थित है. इस
प्रकार सूर्य पृथ्वी तथा इन ग्रहों के मध्य
रहता है. जब गोचरवश (Transit) भ्रमण के समय बुध व
शुक्र पृथ्वी से दूर चले जाते है तो सूर्य इन दोन
ग्रहो व पृथ्वी के मध्य आ जाता है. सूर्य
कभी भी पृथ्वी एवं
चन्द्रमा के मध्य नही आता (गुजरता).
जब दो ग्रह एक राशि के एक ही बिन्दु के निकट
होते है तो योग का निर्माण करते है . इस स्थिति में प्रत्येक
ग्रह दोनो तरफ
अपनी किरणो की द्वारा प्रभाव रखते है,
उसे वृत कहा जाता है. शभी ग्रहो में सूर्य ग्रह
सबसे बडा़ (The Sun is most powerful Planet
among planets) होता है तथा इसका वृत 170,
चन्द्र्का 120 और अन्य ग्रहो का 70 मिनट होता है. आमतौर
पर दो मित्र ग्रहो की युति बनती है
तो शुक्र प्रभाव देती है तथा दो शत्रु
ग्रहो की एक राशी में एक बिन्दु पर्
नजदीक आने से अशुभ प्रभाव उप्तन्न होता है.
जब कोई भी ग्रह सूर्य से सम्बन्ध स्थापित
करता है, सूर्य से युती (conjunction with
the Sun) बनता है. या सूर्य के निकट आता है तो अस्त
विकल या ग्रहण में माना जाता है.उस अवस्था में व ग्रह
शक्तिहीन हो जाता है.
जबकी चन्द्रमा का साथ
युती (conjunction with the Moon) बनाने से
ग्रह शक्तिशाली हो जाता है.
ग्रह के सुर्य से 50 मिनट अन्तर पर् होने से वह पूर्ण
रूपसे अस्त (Combust) होता है. 100 के अन्तर पर् होने
से साधारण रुपसे अस्त तथा 150 बाहर निकल जाने पर अस्त
प्रभाव समाप्त हो जाता है उस स्थिति में ग्रह पूर्ण रूप से
जाग्रत अवस्था में होता है. जहाँ एक ओर वैदिक
ज्योतिषी सभी ग्रहों की युति को फलित
की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते है,
वहीं दुसरी और और पाश्चात्य
ज्योतिषी केवल सूर्य व चन्द्र की अन्य
ग्रहो से युति को ही महत्व देते है.
वैदिक ज्योतिर्विद ग्रहो की युति को फलादेश
(Prediction of planetary conjunction) में ,
तथा प्रकरण में, गोचरवश भ्रमण (Movement in transit)
में तथा भिन्न-2 कार्यो के लिए उपयुक्त मुहुर्त्त के सन्दर्भ में
काफी महत्वपूर्ण मानते है. वैसे
भी ग्रहो की युति व्यक्ति पर
अपना शुभ या अशुभ प्रभाव (Auspicious and
inauspicious result of planetary conjunction on
individuals) अवश्य
छोड़ती है.शास्त्री मोहनमुरारी जी कहते
हे
ग्रहण का वास्तबिक अर्थ है वस्तु (ग्रह) का आँखो से
ओझल हो जाना , यदि वस्तु पूरी तरह से अदृश्य
रहती है तो पूर्ण ग्रहण (Full eclipse)
कहालाता है, और आंशिक रूप से अदृश्य रहने पर आंशिक
ग्रहण( Partly eclipse) लगता है.
यदि हम ग्रहो की परिप्रेक्ष्य में देखें तो तो सूर्य
से बुध लगभग 360 लाख(3 करोड़ 60 लाख) मील
दूरी पर है, शुक्र 6 करोड़ 70 लाख
मील दूरी और पृथ्वी 9
करोड़ 30 लाख मील
की दुरी पर है.
चन्द्रमा पृथ्वी के चारो और परिक्रमा करता है,
तथा पृथ्वी से इसकी दूरी 2
लाख 40 हजार किलोमीटर है. इस प्रकार
चन्द्र्मा बुध, और शुक्र, सूर्य व पृथ्वी के
बीच में आ सकते है.
उसी प्रकार सूर्य से मंगल 14 करोड़ 20 लाख,
बृहस्पति 48 करोड़ 30 लाख तथा शनि लगभग 88 करोड़ 60
लाख मील दूरी पर स्थित है. इस
प्रकार सूर्य पृथ्वी तथा इन ग्रहों के मध्य
रहता है. जब गोचरवश (Transit) भ्रमण के समय बुध व
शुक्र पृथ्वी से दूर चले जाते है तो सूर्य इन दोन
ग्रहो व पृथ्वी के मध्य आ जाता है. सूर्य
कभी भी पृथ्वी एवं
चन्द्रमा के मध्य नही आता (गुजरता).
जब दो ग्रह एक राशि के एक ही बिन्दु के निकट
होते है तो योग का निर्माण करते है . इस स्थिति में प्रत्येक
ग्रह दोनो तरफ
अपनी किरणो की द्वारा प्रभाव रखते है,
उसे वृत कहा जाता है. शभी ग्रहो में सूर्य ग्रह
सबसे बडा़ (The Sun is most powerful Planet
among planets) होता है तथा इसका वृत 170,
चन्द्र्का 120 और अन्य ग्रहो का 70 मिनट होता है. आमतौर
पर दो मित्र ग्रहो की युति बनती है
तो शुक्र प्रभाव देती है तथा दो शत्रु
ग्रहो की एक राशी में एक बिन्दु पर्
नजदीक आने से अशुभ प्रभाव उप्तन्न होता है.
जब कोई भी ग्रह सूर्य से सम्बन्ध स्थापित
करता है, सूर्य से युती (conjunction with
the Sun) बनता है. या सूर्य के निकट आता है तो अस्त
विकल या ग्रहण में माना जाता है.उस अवस्था में व ग्रह
शक्तिहीन हो जाता है.
जबकी चन्द्रमा का साथ
युती (conjunction with the Moon) बनाने से
ग्रह शक्तिशाली हो जाता है.
ग्रह के सुर्य से 50 मिनट अन्तर पर् होने से वह पूर्ण
रूपसे अस्त (Combust) होता है. 100 के अन्तर पर् होने
से साधारण रुपसे अस्त तथा 150 बाहर निकल जाने पर अस्त
प्रभाव समाप्त हो जाता है उस स्थिति में ग्रह पूर्ण रूप से
जाग्रत अवस्था में होता है. जहाँ एक ओर वैदिक
ज्योतिषी सभी ग्रहों की युति को फलित
की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते है,
वहीं दुसरी और और पाश्चात्य
ज्योतिषी केवल सूर्य व चन्द्र की अन्य
ग्रहो से युति को ही महत्व देते है.
वैदिक ज्योतिर्विद ग्रहो की युति को फलादेश
(Prediction of planetary conjunction) में ,
तथा प्रकरण में, गोचरवश भ्रमण (Movement in transit)
में तथा भिन्न-2 कार्यो के लिए उपयुक्त मुहुर्त्त के सन्दर्भ में
काफी महत्वपूर्ण मानते है. वैसे
भी ग्रहो की युति व्यक्ति पर
अपना शुभ या अशुभ प्रभाव (Auspicious and
inauspicious result of planetary conjunction on
individuals) अवश्य छोड़ती है.

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