Wednesday, May 7, 2014

ज्योतिष विज्ञान में सूर्य

ज्योतिष विज्ञान में सूर्य का विशेष महत्व है।
सूर्य पूर्व दिशा का पुरुष, रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति और क्रूर
ग्रह है।
सूर्य आत्मा, स्वभाव, आरोग्यता, राज्य और देवालय का सूचक
तथा पितृ कारक है।
सूर्य आत्मबल का, आत्मविश्वास का कारक है।
सूर्य का नेत्र, कलेजा, मेरुदंड आदि पर विशेष प्रभाव पड़ता है
इससे शारीरिक रोग, सिरदर्द, अपचन, क्षय,
महाज्वर, अतिसार, नेत्र विकार, उदासीनता, खेद,
अपमान एवं कलह आदि का विचार किया जाता है।
ज्योतिष में सूर्यदेव आत्मा कारक और पितृ कारक है,पुत्र राज्य
सम्मान पद भाई शक्ति दायीं आंख
चिकित्सा पितरों की आत्मा शिव और
राजनीति का कारक है.
मेष राशि में उच्च का एवं तुला में नीच
का ना जाता है,चन्द्रमा देव ग्रह है,तथा सूर्य का मित्र है,
मंगल भी सूर्य का मित्र है,गुरु सूर्य का परम मित्र
है,बुध सूर्य के आसपास रहता है,और सूर्य का मित्र
है,शनि सूर्य पुत्र है लेकिन सूर्य का शत्रु है,कारण सूर्य
आत्मा है और आत्मा का कोई कार्य
नही होता है,जबकि शनि कर्म का कारक है,शुक्र
का सूर्य के साथ संयोग नही हो पाता है,सूर्य
गर्मी है और शुक्र रज है सूर्य
की गर्मी से रज जल जाता है,और
संतान होने की गुंजायस
नही रहती है,इसी लिये
सूर्य का शत्रु है,राहु विष्णु का विराट रूप है,जिसके अन्दर
सम्पूर्ण विश्व खत्म हो रहा है,राहु सूर्य और चन्द्र
दोनो का दुश्मन है,सूर्य के साथ होने पर पिता और पुत्र के
बीच धुंआ पैदा कर देता है,और एक दूसरे को समझ
नही पाने के कारण दोनो ही एक दूसरे
से दूर हो जाते है,केतु सूर्य का सम है,और इसे
किसी प्रकार की शत्रु या मित्र
भावना नही है,सूर्य से सम्बन्धित
व्यक्ति पिता चाचा पुत्र और ब्रहमा विष्णु महेश
आदि को जाना जाता है,आत्मा राज्य यश पित्त
दायीं आंख गुलाबी रंग और तेज का कारक
है।

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