Wednesday, August 6, 2014

|| सूर्य और मंगल का योग। ||

|| सूर्य और मंगल का योग। ||
सूर्य और मंगल का संयोग एक शुभ संयोग है। मानो एक सक्षम
आत्मा काया (कालपुरुष का लग्नेश) में अवतरित हुई है और
अपने जीवन के उदेश्य की प्राप्ति के
लिए कृतसंकल्प है। उसका यह जीवन अपने पूर्व
के जीवन के शुभ पक्षों/कर्मों से लयबद्ध है। और
इसका हासिल यह है कि वह इस जीवन में त्वरित
सफलता प्राप्त करता है। क्योंकि इसके लिए उसके पास यथोचित
बल भी है। परिणामतः उसे मान-सम्मान
भी हासिल है। ज्यों-ज्यों वह जीवन
में आगे बढ़ता है त्यों-त्यों उसकी पद
प्रतिष्ठा भी बढ्ने लगती है। यह
लाज़मी भी है क्योंकि सूर्य
भी स्नै: - स्नै: उचाइयों को और प्रबलता को प्रतिदिन
प्राप्त करता है। दिनकर की दिवायात्रा निरंतर है।
इसलिए जातक के उज्ज्वल जीवन में
भी निरतरता और
प्रखरता बनी रहती है।
होना भी चाहिए क्योंकि सूर्य को आखिर अपने
उच्चकारक ग्रह का सानिध्य प्राप्त है। चूंकि मंगल का बल
भी संयुक्त है तो निरंतरता और प्रखरता के पक्ष
को बल देने में कोई असुविधा नहीं है। उसे तो इस
जीवन में सौद्देश्य काम ही काम है।
वह सेवानिवृत होना नहीं जानता। सेवानिवृत होने के
पश्चात भी उसके पास काम की कोई
कमी नहीं है। वह घर
की चाहरदीवारी के
पीछे कैद हो कर नहीं रहने वाला।
वह सूर्य की तरह प्रतिदिन उदित होता है।
दुनिया के लोगों से मिलता जुलता है और सामाजिक कार्य में
भी लगा होता है। सरकार के प्रिय होने के कारण
सरकारी पक्ष से तो लाभ
की स्थिति रहती ही है।
वह धनी होता है। उसके पास जगह-
जमीन भी होती है। भाई-
बंधु वाला होता है। साफ दिल वाला और सच्चा शख्श होता है।
माना उसमें क्रोध है लेकिन यह उसके जीवन में
आगे बढ्ने कि आग भी तो है। जीवन में
मिलने वाले संघर्ष पर विजय प्राप्ति का भी तो यह
एक श्रोत है। अपने प्रतिद्वंद्वी या शत्रु को पराजित
करने का भी तो पराक्रम है। आत्माकारक
की देहकारक और पराक्रमकारक के साथ संयोग
अद्भुत है ! यह योग जन्म के दिन से ही शुभ
और श्रेष्ठ फल देते हैं और इस बात
की भी सूचना देते है कि व्यक्ति के
साथ-साथ उसके बंधु-बांधव भी सफल लोग होंगे।
भ्राता भी दौलतमंद होंगे।
पिता प्रभावशाली होते हैं। अर्थात उसके सम्यक
विकास के लिए उपयुक्त माहौल मिलता है और जीवन
में उचाइयाँ प्राप्त करता हुआ पूर्णायु तक जीता है।
अशुभ स्थिति में यह योग
पीड़ादायी भी है। पिता और
भाई से/ के सुख में कमी के आलवा मातुल पक्ष से
भी चिंताएँ रहती हैं। अर्थात खून से
जुड़े रिश्तेदार से/का सुख बाधित होता है। भाई-बंधु से वैर
होता है। रक्तविकार, रक्तचाप
आदि जानलेवा हो जाती हैं। पद-प्रतिष्ठा दांव पर
होता है - मान-सम्मान को धक्का लगता है। काम-काज में धोखे
होते हैं। घर के बाहर भी लोगों के साथ विरोधपूर्ण
रवैया होता है जैसा एक घमंडी और जमाने
का भूखा रुग्ण शेर है और आग उगलने वाली आँख
से सामने वाले को देख रहा है और
अपनी भारी दहाड़ के उपरांत
चीर-फाड़ कर निगल जाने वाला है ! लेकिन दुखद बात
यह है कि कालांतर में ना ही वह शेर दिल
रहता है, ना ही उसका घमंड रहता है,
ना ही शेर का पराक्रम पाता है,
ना ही उसकी आँखों कि रोशनी सलामत
रहती है बस एक भारी आवाज़
रहती है जिससे उसका थकान व्यक्त होता है।
और जो सूरज चढ़ता होना चाहिए था वह असामयिक रूप में ढल
जाता है।
महिलाओं कि कुंडली में अशुभ स्थिति में उसके
वैवाहिक जीवन अंगार भर देता है। और स्वयं
जातिका ही अपने सुख कि होलिका दहन करने पर
आमादा होता है। ऐसे में जातिका का पति और संतान
भी क्रोध से उबलता रहता है। और रिश्ते के
महीन धागे को क्षण में क्रोध के आग से
जला देता है।
(इस योग में मंगल कि अशुभता अधिक ध्यान देने योग्य है।
जो लाल किताब का अध्ययन करते हैं वो बखूबी इस
बात को समझते हैं)।

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