Thursday, May 8, 2014

नववधू

नववधू को भारी और विभिन्न आभूषणों के पहनाए
जाने के वैज्ञानिक कारण ही हैं। पहले जब वधू
को कमरधनी (तग़डी) पहनाई
जाती थी और गले में
भारी हार पहनाए जाते थे और भारी-
भारी पायजेब भी पहनाई
जाती थी तो उसके पीछे
तथ्य शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखना था। ये विशेष
आभूषण भारी होने से एक्युप्रेशर के पाईन्ट
को दबाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं और पायल
रिप्रोडेक्टिव ऑर्गनको भी ठीक
रखती थी। यही कारण है
कि आभूषण केवल
çस्त्रयाँ ही नहीं पहनती थीं बल्कि पुरूष
भी ब़डे और भारी आभूषण धारण
किया करते थे। आज
भारी आभूषणों की जगह हल्के और
सुंदर आभूषणों ने ले ली है और इन सबके
पीछे काल और परिस्थिति का बदल जाना है।

मांगलिक गीत : नववधू जब घर में प्रवेश
करती है तो मंगल गीतों से
उसका स्वागत होता है और विवाह से पूर्व
भी उसके मायके में गीत गाए जाते हैं।
इन गीतों का संबंध ज्योतिष के परिपेक्ष में घर
की नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करना मंगल गान व
साजों की ध्वनि से सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है।
प्राचीन समय में यह गीत कन्या व
युवक दोनों ही घरों में विवाह से पूर्व लगभग 15
दिन पहले से गाए जाते थे। आज इसका स्वरूप बदल गया है
तथा इसका स्थान आधुनिक
फिल्मी गीतों व साजों ने ले लिया है और
एक ही दिन महिला संगीत का आयोजन
कर दिया जाता है। निश्चितत: ऎसा आधुनिक भाग-दौ़ड
भरी जिंदगी के कारण है परंतु फिर
भी कुछ आयोजन ऎसा अवश्य किया जाना चाहिए
जिसका संबंध आध्यात्म से हो।

कन्या विदाई और तारा दर्शन :
महर्षि वसिष्ठ सूर्यवंशी राजाओं के एकमात्र गुरू
रहे हैं। अरून्धती के समान रूप, गुण व धर्म-
परायण दूसरी कोई
स्त्री नहीं है
तथा अरून्धती की आयु सात कल्पों तक
मानी गई है। वे सदैव अपने पति के साथ
रहती है। अरून्धती के अतिरिक्त
अन्य
किसी भी ऋषि पत्नी को सप्तर्षि मंडल
में स्थान नहीं मिला है। नववधू को विवाह के
अवसर पर तारा दर्शन की रस्म के रूप में
देवी अरून्धती के
ही दर्शन कराए जाते हैं।
ऎसी मान्यता है कि इसके दर्शन से
अरून्धती के जैसे गुणों का विकास नववधू में
हो तथा जिस प्रकार अरून्धती का अखण्ड सौभाग्य
बना हुआ है, उसी प्रकार नववधू
का भी सौभाग्य अखण्ड रहे।

रसोई प्रवेश : वधू के ससुराल में प्रवेश से कुछ समय बाद
ही विधि पूर्वक उसे रसोई में एक निश्चित मुहूत्त में
खाना बनाने के लिए भेजा जाता है। आश्चर्यजनक बात है कि खाने
में सबसे पहले कुछ मीठा बनवाया जाता है और घर
के प्रत्येक वरिष्ठ सदस्य वधू को शगुन के रूप में कुछ ना कुछ
उपहार अवश्य देता है। मीठा बनवाने के
पीछे संभवत:
यही धारणा रही होगी कि नए
परिवेश में आकर रिश्तों की मिठास बनाए रखने
की प्रेरणा वधू को मिले और उपहार देने के
पीछे भी संभवत:
यही तथ्य रहा होगा कि सामंजस्य और
रिश्तों को निभाने की भावना लगातार
बनी रहे और बहू अपने उत्तरदायित्व
को यहीं समझ लें और परिवार
की मान्यताओं और वरिष्ठ सदस्यों के प्रति सम्मान
से भरी रहे। ज्योतिष शास्त्र की मूल
भावना यह है कि मनुष्य का जीवन शांति एवं
प्रसन्नतापूर्वक चलता रहे, इसी उद्देश्य
की पूर्ति के लिए ज्योतिष आचार्यो ने ऎसे शुभ
क्षणों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पालन करने
की प्रथा का चलन किया। यद्यपि आधुनिक युग में इन
प्रथाओ ने अपना रूप बदल लिया है परंतु नाम
वही हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम
उन प्रथाओं का उसी रूप में पालन करें जिस रूप में
हमसे अपेक्षित हैं।

माथे का टीका :-
यह आभूषण माथे पर लटका रहता है किन्तु
इसकी चेन का हुक पीछे सर के लगभग
बीच में बालों में लगा रहता है जिससे मष्तिस्क
को विशेष शांति और नियंत्रण प्राप्त होता है |
आभूषण में चांदी व सोने का प्रमुखता से प्रयोग
इसलिए होता है क्योंकि चांदी शीतल
होती है जबकि सोना गर्म | इसके पहनने से कैंसर
होने की आशंका नगण्य रहती है
साथ ही दोनों धातु शरीर में रक्त संचालन
को संतुलित करने में भरी योगदान देती ह माथे की बिंदी :-
माथे पर दोनों भौहों के मध्य थोड़ा ऊपर एक ब्रह्म छिद्र
रहता है जिस पर राखी हुई
बिंदी मस्तिष्क के विचारों को सुव्यवस्थित
रखती है यह बिंदी तथा मांग में
भरा जाने वाला सिंदूर परे का लाल आक्साइड होता है
जो पोषकतत्व होने के नाते शरीर पर विशिष्ट प्रभाव
डालता है साथ ही चेहरे पर झुर्रियों को जल्द पड़ने
नहीं देता है |

मांग भरना : विवाह के समय वधू की माँग सिंदूर से
भरने का प्रावधान है तथा विवाह के पश्चात्
ही सौभाग्य सूचक के रूप में माँग में सिंदूर
भरा जाता है। यह सिंदूर माथे से लगाना आरंभ करके और
जितनी लंबी मांग हो उतना भरा जाने
का प्रावधान है। यह सिंदूर केवल सौभाग्य
का ही सूचक नहीं है इसके
पीछे जो वैज्ञानिक धारणा है कि वह यह है
कि माथे और मस्तिष्क के चक्रों को सक्रिय बनाए रखा जाए जिससे
कि ना केवल मानसिक शांति बनी रहे बल्कि सामंजस्य
की भावना भी बराबर
बलवती बनी रहे।

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