Friday, May 9, 2014

शनि के रूप

सबसे पहले शनि के रूप
को समझना जरूरी है,शनि एक ठंडा अन्धेरा और ग्रह
है,सिफ़्त कडक है,रूखा है,उसके अन्दर भावनाओं
की कोई कद्र नही है,जिस भाव में
होता है उस भाव के कामो कारकों और
जीवों को जडता में रखता है,इसके
अलावा शनि की सप्तम
द्रिष्टि भी खतरनाक
होती है,जहां जहां इसकी छाया अपना
रूप देती है वहां वहां यह
अपनी जडता को प्रस्तुत करता है।
शनि की जडता की पहिचान वह अपने
कामो से करवाता है और अपने पहिनावे और रहन सहन से
भी करवाता है,इस पहिचान के लिये
शनि की द्रिष्टि को तीसरे भाव से
भी देखा जाता है। शनि का अपना परिवार
भी होता है उस परिवार को यह
अपनी पहिचान के अन्दर ही शामिल
रखता है और उस परिवार में अधिकतर लोग कार्य
वाली शिक्षाओं को करने वाले और
लोहा मशीनरी आदि को काटने जोडने और
कई तरह के रूप परिवर्तन वाले कामों को करने वाले होते है।
शनि की नजर सप्तम में होने के कारण
पत्नी या पति का स्वभाव तेज बोलने का होता है,वह
कोई भी बात जोर से चिल्लाकर केवल इसलिये करता है
या करती है कि शनि की सिफ़्त
वाला व्यक्ति बहुत कम
ही किसी की सुनता है और
जो सुनता है उसे करने के अन्दर काफ़ी समय
लगता है,कम सोचने की आदत होने से और कम
बोलने की आदत होने से या गम्भीर बात
करने के कारण या फ़ुसफ़ुसाकर बात करने की आदत के
कारण चिल्लाकर बात सुनने के लिये जोर दिया जाता है।
शनि की जो पैत्रिक पहिचान होती है
वह कार्य करने के रूप में कार्य के करने वाले स्थान के रूप में उस
स्थान पर जहां पानी की सुलभता कम
होती है वहां रहने से
भी मानी जाती है,अधिकतर
जब पानी की सुलभता कम
होती है तो रहने और जीविकोपार्जन के
साधन भी कम होते है,इसलिये
शनि की सिफ़्त वाले व्यक्ति के
पूर्वजों को या पिता को बाहर जाकर कमाने की जरूरत
पडती है,शनि की सिफ़्त के अनुसार
ही जातक कार्य करता है और
जो भी कार्य करता है वह मेहनत वाले काम होते
है।
राहु की आदत को समझने के लिये केवल
छाया को समझना काफ़ी है। राहु
अन्दरूनी शक्ति का कारक है,राहु
सीमेन्ट के रूप में कठोर बनाने
की शक्ति रखता है,राहु शिक्षा का बल देकर ज्ञान
को बढाने और दिमागी शक्ति को प्रदान करने
की शक्ति देता है,राहु बिजली के रूप में
तार के अन्दर अद्रश्य रूप से चलकर भारी से
भारी मशीनो को चलाने
की हिम्मत रखता है,राहु आसमान में बादलों के
घर्षण से उत्पन्न अद्रश्य शक्ति को चकाचौन्ध के रूप में
प्रस्तुत करने का कारक होता है,राहु जड या चेतन
जो भी संसार में उपस्थित है और
जिसकी छाया बनती है उसके अन्दर
अपने अपने रूप में अद्रश्य रूप में उपस्थित होता है।
शनि राहु को आपस में मिलाने पर अगर शनि पत्थर है और राहु
शक्ति को मिलाकर उसे प्रयोग किया जायेगा तो सीमेन्ट
का रूप ले लेता है,शनि में मंगल को मिलाया गया तो वह लिगनाइट
नामक का पत्थर बनकर और उसके अन्दर लौह तत्व
की अधिकता से जल्दी से जुडने
वाला सीमेंट बन जाता है,राहु अगर लोहे के साथ मिल
जाता है तो वह स्टील का रूप ले लेता है,लेकिन
अलग अलग भावों के अनुसार राहु को समझना पडता है,एक भाव
में वह हिम्मती बनाता है और कार्य करने
की शक्ति को बढाकर बहुत अधिक बल देता है,लेकिन
दूसरे भाव में जाकर वह धन और बल
वाली शक्ति को प्रदान करना शुरु देता है,व्यक्ति के
पास काम बहुत अधिक होता है लेकिन धन के रूप में
वही मिल पाता है जो मुश्किल से पेट को भरा जा सके।
शनि को कार्य के लिये माना जाता है और वह जब
तीसरे भाव से सम्बन्ध बना लेता है
तो फ़ोटोग्राफ़ी वाले कामो की तरफ़
अपना ध्यान देने लगता है,छठे भाव में जाने पर वह दवाइयों से
सम्बन्धित काम करने लगता है,सप्तम में जाकर वह खतरनाक
लोगों की संगति देने लगता है तथा अष्टम में जाकर
शमशान के धुयें की तरफ़ से काम करने लगता है,नवे
भाव मे जाकर वह धर्म और ज्योतिष के साथ यात्रा वाले काम और
रेगिस्तानी काम करने के लिये
भी अपनी शक्ति देता है। दसवे भाव मे
दोनो की शक्ति राजकार्य के लिये माने जा सकते है और
किसी भी अचानक
कार्यों की उथल पुथल के लिये
भी माना जा सकता है। ग्यारहवे भाव में शनि राहु
अपनी सिफ़्त के अनुसार बडे भाई को या दोस्तों के
कामों को करने के लिये
भी अपनी रुचि देता है,बारहवें भाव में
शनि राहु का रूप तंत्र मंत्र और ज्योतिष आदि में रुचि रखने
वाला भी माना जाता है।
जीवन के चार आयाम माने जाते है,पहला धर्म
का होता है दूसरा अर्थ का माना जाता है,तीसरा काम
होता है और चौथा जो मुख्य होता है उसे मोक्ष
की संज्ञा दी जाती है।
शनि को इन चारों आयामों के अन्दर प्रकट करने के लिये अगर
माना जाये तो धर्म में शनि का रूप कई प्रकार से
अपनी मान्यता देगा। घर में माता पिता और घर के
सदस्यों के प्रति निभाई गयी जिम्मेदारियों के
प्रति शनि अपने कर्म को प्रकट करेगा,उनके आश्रय के लिये बनाये
गये निवास स्थान और
उनकी जीविका को चलाने के लिये दिये गये
कार्य या व्यवसाय स्थान माने जा सकते है,परिवार के बाद समाज
का रूप सामने आता है उसके अन्दर धर्म से शनि को प्रकट करने
के लिये आने जाने के रास्ते बनवाना,अनाश्रित
लोगों की सहायता करना,भूखो को भोजन देना और
असहायों की दवाइयों आदि से मदद
करना माना जायेगा,इसी प्रकार से जब राहु का मिश्रण
धर्म के अन्दर मिलेगा,तो परिवार के लोगों के लिये शिक्षा का बन्दोबस्त
करना,परिवार के लोगों के लिये कार्य शक्ति का विकास
करना,जो भी वे कार्य करते है उन कार्यों के अन्दर
अपनी शक्ति का समावेश करना आदि माना जायेगा।
शनि राहु को धर्म में ले जाने और पूजा पाठ मे प्रवेश करवाने पर
शनि राहु मन्दिर का रूप लेता है,शनि राहु की सिफ़्त
को शेषनाग के रूप में भी प्रकट किया जाता है,यह
शरीर और इसकी शक्ति को विकास करने में
शनि राहु
की महती भूमिका मानी जा
सकती है,जैसे कि आत्मा को सुरक्षित रखने के लिये
इस शरीर का शक्तिवान और कार्यशील
होना भी जरूरी है,अगर
शरीर असमर्थ होगा उसके अन्दर कार्य करने
की शक्ति नही होगी तो
जल्दी ही आत्मा शरीर से
पलायन कर जायेगी और शरीर शव का रूप
धारण कर नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा। समुद्र के अन्दर शेष शय्या पर
भगवान विष्णु को दिखाया जाना केवल शरीर के अन्दर
आत्मा को सुरक्षित रखने का प्रयास
ही माना जा सकता है,इस संसार
रूपी समुद्र में शेषनाग
रूपी शरीर में विष्णु
रूपी आत्मा आराम कर रही है।
लालकिताब में शनि के साथ राहु को शेषनाग की युति से
विभूषित किया गया है,और बताया भी गया है कि जिस
जातक की कुण्डली में यह योग होता है
वह शेषनाग के फ़नों के अनुसार एक साथ कई दिशाओं में
अपनी द्रिष्टि रखने वाला होता है। मेरे विचार से यह
कथन बिलकुल सही है,आज के युग में
हो या प्राचीन काल में जिस
व्यक्ति की द्रिष्टि चारों तरफ़
गयी वही सभी स्थान से
सफ़ल माना जा सकता है,लेकिन जो व्यक्ति एक
ही दिशा या एक ही काम के अन्दर
अपनी प्रोग्रेस चाहने की कामना में
लगा रहा और उस काम या उस वस्तु का युग समाप्त होते
ही वह बेकार हो गया और उसके लिये
दूसरा रास्ता सामने आने में जितना समय लगा वह वक्त उसके लिये
बहुत ही खराब माना जा सकता है। जिस जातक
की कुंडली में यह योग होता है वह
चारों दिशाओं में अपने दिमाग को ले जाने वाला होता है उसे एक
दिशा से
कभी संतुष्टि नही होती है।
शनि राहु की युति को शेषनाग योग से विभूषित
किया गया है। जिस जातक की कुंडली में
यह योग बारहवें भाव में होता है उसके लिये रक्षक
भी संसार होता है। वह अक्सर
इतना बडा तंत्री होता है कि वह
अपनी निगाह से जमीन के
नीचे से लेकर आसमान की ऊंचाई वाले
कामों को भी कर सकता है और परख
भी सकता है। शनि का निशाना अपने से
तीसरे स्थान पर होता है राहु
का निशाना भी अपने से तीसरे स्थान पर
होता है,दोनो का निशाना एक ही प्रकार का होने से
जो भी असर तीसरे स्थान पर होगा वह
मशीनी गति से होगा,अचानक तो बहुत
लाभ दिखाई देने लगेगा और अचानक ही हानि दिखाई
देने लगेगी। शनि का रूप कार्य से माना जाये और राहु
का रूप शक्ति से माना जाये तो कार्य के अन्दर अचानक
शक्ति का विकास दिखाई देने लगेगा और कार्य के रूप में दिखाई देने
वाला रूप कभी कभी धुयें
की तरह उडता दिखाई देगा। बारहवें भाव में शनि और
राहु के होने से आसमानी धुयें की तरह
माना जासकता है,व्यक्ति के अन्दर अगर निर्माण के कार्य होंगे
तो उसका कार्य उस क्षेत्र में होगा जहां पर
फ़ैक्टरियों की चिमनियां होंगी,और आसमान
में धुंआ दिखाई देगा। अगर यह युति बारहवें भाव में सिंह राशि में
होगा तो जहां व्यक्ति का कार्य स्थान होगा वह
किसी तरह से सरकार या राजनीतिक
कारणों से सम्बन्धित भी होगा। शनि राहु
की बारहवें भाव से दूसरे भाव में द्रिष्टि होने से कार्य
केवल धन और भौतिक वस्तुओं के निर्माण से सम्बन्धित
होगा,उन्ही वस्तुओं का निर्माण किया जायेगा जिनसे धन
को बनाया जा सके और व्यापारिक कारणों से
माना जा सके,जो भी निर्माण किया जायेगा वह व्यापारिक
संस्थानों को दिया जायेगा,खुद ही डायरेक्ट रूप से व्यापार
नही किया जा सकेगा। धन के लिये व्यापारिक संस्थान
ही अपना योगदान देंगे,बारहवें भाव मे स्थापित
शनि और राहु की नजर में
चौथी द्रिष्टि भी महत्वपूर्ण
मानी जायेगी,कार्य का रूप और कार्य
की सोच कार्य करने का स्थान कार्य करने वाले लोग
कार्य के द्वारा प्राप्त किये गये उत्पादनों को रखने का स्थान,कार्य
करने के बाद जो उत्पादन होगा उसका अन्त आखिर में
क्या होगा इस बात के लिये शनि और राहु से चौथा भाव देखना बहुत
जरूरी होता है। कुंडली के छ: आठ
बारह और दूसरे भाव का गति चक्र अपने अनुसार चलता है।
बारहवां भाव छठे भाव को देखता है,और दूसरा भाव आठवें
को देखता है,वही गति छठे और आठवें
की होती है। जैसे बिना कार्य किये मोक्ष
यानी शांति नही मिलती है
और बिना रिस्क लिये धन
की प्राप्ति नही होती है।
उसी तरह से बिना धन के रिस्क
नही लिया जा सकता है और
बिना शांति की आशा के कार्य
नही किया जा सकता है,बारहवां भाव
जरूरतों का होता है तो वह कार्य करने के लिये प्रेरित
करता है,दूसरा भाव धन का होता है तो प्राप्त करने के लिये रिस्क
लेने के लिये मजबूर
करता है,जो जितनी बडी रिस्क लेता है
उतना ही उसे फ़ायदा और नुकसान होता है लेकिन
छठे और बारहवें भाव को देखे बिना जो रिस्क लेते है वे
या तो बहुत बडे नुकसान में जाते है या फ़िर बहुत बडे फ़ायदे में
रहते है,लेकिन समान रूप से फ़ायदा लेने के लिये छठे और बारहवे
भाव वाले
कार्यों को करना भी जरूरी होता है। हर
भाव की कडी एक दूसरे भाव से
जुडी होती है,अक्सर शनि जो कलयुग
का कारक है और राहु जो कलयुग के शक्ति को देने वाला है
दोनो के अन्दर समाजस्य रखने के लिये अन्य
ग्रहों की स्थिति और उन ग्रहों के अनुसार किये जाने
वाले कार्य अपने अपने अनुसार फ़ल देने वाले होते है।
प्रस्तुत कुंडली को देखिये,यह अहमदाबाद के एक
जातक की है,शनि राहु सिंह राशि के है और और
बारहवें भाव में विराजमान
है.किसी भी ग्रह से आगे का शनि राहु
व्यक्ति के उस ग्रह से सम्बन्धित कारक के लिये भार
जैसा हो जाता है और किसी ग्रह से
पीछे का शनि उस व्यक्ति के लिये आगे बढने के लिये
प्रेरित करता रहता है। शनि राहु से पीछे गुरु शुक्र
सूर्य और बक्री बुध है। गुरु जातक के
प्रति अपनी व्याख्या देता है,शुक्र जातक
की पत्नी और परिवारिक सम्पत्ति के लिये
अपनी योग्यता को देता है,सूर्य
पिता की स्थिति को दर्शाता है,वही
बक्री बुध व्यक्ति का दिमाग बदलने के लिये
माना जा सकता है। गुरु विद्या का कारक भी होता है
और गुरु से सम्बन्ध बनाने के लिये
भी सोचा जाता है,जातक का गुरु कर्क राशि का है उच्च
का है,सूर्य गुरु का साथ है इसलिये गुरु से जीव और
सूर्य से आत्मा को मानने से जीवात्मा योग है,ईश्वर
अंश से जन्म हुया है। सूर्य गुरु के साथ शुक्र
की स्थिति भी एक बडा योग देने के लिये
मानी जा सकती है,कारण शुक्र जो भौतिक
सुख का कारक है और पत्नी के रूप में
अपनी औकात बनाता है के कारण जातक
की जिन्दगी बहुत उत्तम
मानी जा सकती है,लेकिन सामने जाते
ही बारहवें भाव का राहु और
शनि अन्धेरा देता है,कार्यों के लिये सिर को फ़ोडने
जैसी बात होती है,बहुत बडा कार्य
करने के लिये बुद्धि को प्रदान करता है। मै पहले
ही बताकर आया हूँ कि हर भाव के बारहवें भाव में
विराजमान शनि और राहु के अलावा ग्रह भी अपना रूप
शेषनाग की भांति प्रस्तुत करते है। जैसे कार्य भाव में
उक्त कुंडली में मंगल है,और मंगल से आगे
बक्री बुध है,शुक्र है सूर्य है और गुरु है,यह
मन्गल अपने कारणों से व्यक्ति के लिये अपना बल देगा,और अपने
कार्यों से व्यक्ति के लिये अपना फ़ल देने वाला होगा। गुरु सूर्य
शुक्र और बक्री बुध अपने अपने अनुसार मंगल से
फ़ायदा लेने वाले होंगे,सभी लाभ भाव में है और लाभ
का रूप कर्क राशि में है तो जो भी इस मंगल का फ़ल
होगा वह घर के अन्दर ही आयेगा,लेकिन गुरु
का स्थान बडे भाई के घर में स्थापित होने से और मित्रों के भाव में
स्थापित होने से पिता बडे भाई और बडे भाई
की स्त्री के रूप में फ़ल जातक को प्राप्त
होगा। नवम पंचम का योग मंगल के साथ केतु ने
लिया है,नाडी ज्योतिष के अनुसार ग्रह के त्रिकोण से
मिलने वाले बलों में भी मिक्चर मिला हुआ माना जाता है।
मिथुन का मंगल प्रदर्शन के रूप में माना जाता है केतु जब छठे भाव
मे है और कुम्भ राशि में है तो नौकरी का बल मंगल
को देगा।

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