Thursday, May 8, 2014

शंख के चमत्कारी गुण

शंख के चमत्कारी गुण..
शंख को विजय, समृद्धि, सुख, यश,
कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक
माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में
भी विभिन्न प्रकार के शंखों का प्रयोग किया जाता है।
आरती, धार्मिक उत्सव, हवन-क्रिया, राज्याभिषेक,
गृह-प्रवेश, वास्तु-शांति आदि शुभ अवसरों पर शंखध्वनि से
लाभ मिलता है। पितृ-तर्पण में शंख की अहम
भूमिका होती है
शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस
मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं
अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य
की वृद्धि होती है। भारतीय
धर्मशास्त्रों में शंख का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान है।
मंदिरों एवं मांगलिक कार्यों में शंख-ध्वनि करने का प्रचलन है।
मान्यता है कि इसका प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ था।
समुद्र-मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में शंख भी एक
है। विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज
की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर
भाई है। अत यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख
है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है।
स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्वपूर्ण
स्थान है। भगवान विष्णु इसे अपने हाथों में धारण करते हैं।
धार्मिक कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है। पूजा-आराधना,
अनुष्ठान-साधना, आरती, महायज्ञ एवं तांत्रिक
क्रियाओं के साथ शंख का वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक महत्व
भी है। प्राचीन काल से
ही प्रत्येक घर में शंख
की स्थापना की जाती है।
शंख को देवता का प्रतीक मानकर पूजा जाता है एवं
इसके माध्यम से अभीष्ट
की प्राप्ति की जाती है।
शंख की विशिष्ट पूजन पद्धति एवं साधना का विधान
भी है। कुछ गुह्य साधनाओं में
इसकी अनिवार्यता होती है। शंख कई
प्रकार के होते हैं और
सभी प्रकारों की विशेषता एवं पूजन-
पद्धति भिन्न-भिन्न है। शंख साधक
को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण करने में सहायक
होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। उच्च
श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर,
मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल
द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये
जाते हैं।
शंख की आकृति के आधार पर इसके प्रकार माने जाते
हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं -
दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। जो शंख
दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है, वह दक्षिणावृत्ति शंख
कहलाता है। जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है,
वह मध्यावृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बायें हाथ से
पकड़ा जाता है, वह वामावृत्ति शंख कहलाता है।
मध्यावृत्ति एवं दक्षिणावृति शंख सहज रूप से उपलब्ध
नहीं होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं
चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं। इनके
अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख,
कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख,
सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख,
शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख
आदि प्रकार के होते हैं।
घर में पूजा-वेदी पर शंख
की स्थापना की जाती है।
निर्दोष एवं पवित्र शंख को दीपावली,
होली, महाशिवरात्रि, नवरात्र, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य
नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त में विशिष्ट कर्मकांड के साथ स्थापित
किया जाता है। रुद्र, गणेश, भगवती, विष्णु भगवान
आदि के अभिषेक के समान शंख का भी गंगाजल, दूध,
घी, शहद, गुड़, पंचद्रव्य आदि से अभिषेक
किया जाता है। इसका धूप, दीप, नैवेद्य से नित्य
पूजन करना चाहिए और लाल वस्त्र के आसन में स्थापित
करना चाहिए। शंखराज सबसे पहले वास्तु-दोष दूर करते हैं।
मान्यता है कि शंख में कपिला (लाल) गाय का दूध भरकर भवन में
छिड़काव करने से वास्तुदोष दूर होते हैं। परिवार के
सदस्यों द्वारा आचमन करने से असाध्य रोग एवं दुःख-दुर्भाग्य
दूर होते हैं। विष्णु शंख को दुकान, ऑफिस,
फैक्टरी आदि में स्थापित करने पर वहाँ के वास्तु-
दोष दूर होते हैं तथा व्यवसाय आदि में लाभ होता है।
शंख की स्थापना से घर में
लक्ष्मी का वास होता है। स्वयं
माता लक्ष्मी कहती हैं कि शंख
उनका सहोदर भ्राता है। शंख, जहाँ पर होगा, वहाँ वे
भी होंगी। देव प्रतिमा के चरणों में शंख
रखा जाता है। पूजास्थली पर दक्षिणावृत्ति शंख
की स्थापना करने एवं पूजा-आराधना करने से
माता लक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है।
इस शंख की स्थापना के लिए नर-मादा शंख
का जोड़ा होना चाहिए। गणेश शंख में जल भरकर प्रतिदिन
गर्भवती नारी को सेवन कराने से संतान
गूंगेपन, बहरेपन एवं पीलिया आदि रोगों से मुक्त
होती है। अन्नपूर्णा शंख
की व्यापारी व सामान्य वर्ग
द्वारा अन्नभंडार में स्थापना करने से अन्न, धन,
लक्ष्मी, वैभव
की उपलब्धि होती है। मणिपुष्पक एवं
पांचजन्य शंख की स्थापना से भी वास्तु-
दोषों का निराकरण होता है। शंख का तांत्रिक-साधना में
भी उपयोग किया जाता है। इसके लिए लघु
शंखमाला का प्रयोग करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त
होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार शंख-ध्वनि से वातावरण का परिष्कार
होता है। इसकी ध्वनि के प्रसार-क्षेत्र तक
सभी कीटाणुओं का नाश हो जाता है। इस
संदर्भ में अनेक प्रयोग-परीक्षण
भी हुए हैं। आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म
से पेट की बीमारियाँ, पीलिया,
यकृत, पथरी आदि रोग ठीक होते हैं।
त्र+षि श्रृंग की मान्यता है कि छोटे-छोटे बच्चों के
शरीर पर छोटे-छोटे शंख बाँधने तथा शंख में जल
भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी-दोष
नहीं रहता है। बच्चा स्वस्थ रहता है। पुराणों में
उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास
रोगी हमेशा शंख बजायें तो बोलने
की शक्ति पा सकते हैं। हृदय रोगी के
लिए यह रामबाण औषधि है। दूध का आचमन कर कामधेनु शंख
को कान के पास लगाने से `ँ़' की ध्वनि का अनुभव
किया जा सकता है। यह सभी मनोरथों को पूर्ण
करता है।
वर्तमान समय में वास्तु-दोष के निवारण के लिए जिन
चीजों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से यदि शंख
आदि का उपयोग किया जाए तो कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं।
यह न केवल वास्तु-दोषों को दूर करता है, बल्कि आरोग्य वृद्धि,
आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-
दोष शांति, विवाह में विलंब जैसे अनेक दोषों का निराकरण एवं निवारण
भी करता है। इसे पापनाशक बताया जाता है। अत
शंख का विभिन्न प्रकार की कामनाओं के लिए प्रयोग
किया जा सकता है।
हिंदू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ
आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण
नहीं माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शंख
बजाने से भूत-प्रेत, अज्ञान, रोग, दुराचार, पाप, दुषित विचार और
गरीबी का नाश होता है। शंख बजाने
की परंपरा प्राचीन काल से
चली आ रही है। महाभारत काल में
श्रीकृष्ण द्वारा कई बार अपना पंचजन्य शंख
बजाया गया था।आधुनिक विज्ञान के अनुसार शंख बजाने से हमारे
फेफड़ों का व्यायाम होता है, श्वास संबंधी रोगों से
लडऩे की शक्ति मिलती है। पूजा के
समय शंख में भरकर रखे गए जल को सभी पर
छिड़का जाता है जिससे शंख के जल में कीटाणुओं
को नष्ट करने की अद्भूत
शक्ति होती है। साथ ही शंख में
रखा पानी पीना स्वास्थ्य और
हमारी हड्डियों, दांतों के लिए बहुत लाभदायक है।
शंख में कैल्शियम, फास्फोरस और गंधक के गुण होते हैं
जो उसमें रखे जल में आ जाते हैं।
भारतीय संस्कृति में शंख को महत्वपूर्ण स्थान
प्राप्त है। माना जाता है कि समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह
रत्नों में से एक शंख भी था।
इसकी ध्वनि विजय का मार्ग प्रशस्त
करती है।
शंख का महत्व धार्मिक दृष्टि से
ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से
भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके प्रभाव से
सूर्य की हानिकारक किरणें बाधक
होती हैं। इसलिए सुबह और शाम शंखध्वनिकरने
का विधान सार्थक है। जाने-माने वैज्ञानिक डॉ.
जगदीश चंद्र बसु के अनुसार,
इसकी ध्वनि जहां तक जाती है,
वहां तक व्याप्त बीमारियों के कीटाणु
नष्ट हो जाते हैं। इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता है। शंख में
गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ
मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित
हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे
महाऔषधिमाना जाता है।
शंख बजाने से दमा, अस्थमा, क्षय जैसे जटिल रोगों का प्रभाव
काफी हद तक कम हो सकता है। इसका वैज्ञानिक
कारण यह है कि शंख बजाने से सांस
की अच्छी एक्सरसाइज
हो जाती है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, शंख में
जल भरकर रखने और उस जल से पूजन
सामग्री धोने और घर में छिडकने से वातावरण शुद्ध
रहता है। तानसेनने अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर
ही गायन शक्ति प्राप्त
की थी। अथर्ववेदके चतुर्थ अध्याय में
शंखमणिसूक्त में शंख की महत्ता वर्णित है।
भागवत पुराण के अनुसार, संदीपन ऋषि आश्रम में
श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु
दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र
में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ। कृष्ण ने समुद्र तट पर
शंखासुरको मार गिराया। उसका खोल (शंख) शेष रह गया।
माना जाता है कि उसी से शंख
की उत्पत्ति हुई। पांचजन्य शंख
वही था। शंख से शिवलिंग,कृष्ण
या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक
करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। शंख की ध्वनि से
भक्तों को पूजा-अर्चना के समय
की सूचना मिलती है।
आरती के समापन के बाद
इसकी ध्वनि से मन को शांति मिलती है।
कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में
दिनचर्या को कुछ समय के लिए विराम देकर मौन रूप से देव
अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय
संस्कृति की धरोहर है। शंख
की पूजा इस मंत्र के साथ
की जाती है.

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