Friday, May 9, 2014

कमल को शुभ क्यों मानते हैं

कमल को शुभ क्यों मानते हैं?
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कमल सत्यम, शुभम एवं सौंदर्य का प्रतीक है।
सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्-ईश्वर का स्वरूप अर्थात स्वभाव
भी यही है। इसी कारण,
ईश्वर के भिन्न-भिन्न रूपों की तुलना कमल से
की गई है जैसे कि कमल-नयन इत्यादि।
कमल का फूल सूर्य उदय के साथ खिलने लगता है और सूर्य
अस्त के साथ ही बंद होने लगता है।
इसी प्रकार हमारा तन भी ज्ञान के
प्रकाश में ही खिलता एवं विकसित होता है। कमल,
कीचड़ में रह कर भी अपने वातावरण
से अप्रभावित रहते हुए सौंदर्य से भरपूर रहता है और हमें
सभी परिस्थितियों में शुद्ध एवं सुंदर रहने के प्रयास
की याद दिलाता है।
कमल के पत्ते जल में रहते हुए
भी गीले नहीं होते और
हमें उस ज्ञानी व्यक्ति की याद दिलाते
हैं जो दुखदायी एवं परिवर्तनशील संसार
से अप्रभावित रहते हुए सदा आनंद में डूबा रहता है।
श्री भगवद्गीता के एक श्लोक में इस
बात को इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है।
जो व्यक्ति मोह त्याग कर, ईश्वर को कर्ता मान कर अपना कर्म
करता है, वह पाप से उसी प्रकार अप्रभावित
रहता है जिस प्रकार कमल-पत्र कीचड़ में रहते
हुए भी पवित्र रहता है। इसलिए कमल को पंकज
भी कहा गया है।
हमारे शरीर में ऊर्जा के विशेष केन्द्र हैं जिन्हें
योग-शास्त्रों में चक्र कहा गया है। प्रत्येक चक्र का संबंध
कमल से है जिनकी पंखुडिय़ों वाला कमल सहस्रार
चक्र का द्योतक है जो हमारे सिर के ऊपरी भाग में
स्थित है।
केवल देवत्व की प्राप्ति होने पर ही,
योगी का यह चक्र खुल जाता है और
योगी को देवत्व अर्थात आत्मा का ज्ञान
हो जाता है। ध्यान में बैठने के लिए भी पदमासन
की सलाह दी गई है जो कमल
का ही रूप है।
शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु
की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ था और विश्व
की रचना करने के लिए भगवान्
ब्रह्मा की भी उत्पत्ति इसी कमल
से हुई थी। अत: कमल सृष्टिकर्ता एवं सर्वोच्च
कारक के बीच
की कड़ी का भी प्रतीक
है।
कमल ब्रह्मलोक का भी प्रतीक
होता है जो भगवान ब्रह्म का निवास स्थान है।
ऐसा कहा जाता है कि मंगल रूपी स्वास्तिक चिन्ह
का उद्भव भी कमल से ही हुआ है।

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